राजधानी शिमला की जनता बीते दस साल से पीलिया का दंश झेल रही है। हर बार सरकारी महकमे यह कहकर अपना पल्ला झाड़ देते हैं कि यह पीलिया बाविड़यों का पानी पीने से फैल रहा है और शुरू हो जाती है लीपापोती। आईपीएच हमेशा दावा करता रहा है कि अश्वनी खड्ड से वह ट्रीटमेंट के बाद ही साफ पानी दे रहा है। नगर निगम भी इस पानी को शुद्ध बताकर आम जनता को सालों से बांटता रहा है।
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हालांकि इस दौरान आम जनता चीखती चिल्लाती रही कि उन्हें पीलिया नगर निगम की ओर से दी जा रही पानी की सप्लाई की वजह से हो रहा है लेकिन हर साल उनकी आवाज किसी न किसी बहाने दबा दी जाती। इस बार भी बहाना बनाकर टरका देते लेकिन पीलिया से हुई मौतों और बढ़ते मरीजों की संख्या के आगे सरकारी अमले की एक न चली। अमर उजाला ने बीते कुछ सालों में विभाग की ओर से इसकी रोकथाम को लेकर क्या कदम उठाए, इस बारे में जानना चाहा।
सरकारी आंकड़ों में हर साल पीलिया के पीड़ितों की संख्या कम ही दर्शाई गई है। हर साल शहर में पीलिया फैलने के बाद नगर निगम और जन एवं सिंचाई विभाग के अफसर नौटंकी करने के लिए कमेटी का गठन करते हैं और प्रस्ताव तैयार करते हैं पर होता कुछ नहीं।
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अफसरों ने किया था दौरा- 2013 में आईपीएच के अधिकारियों ने प्लांट का दौरा किया। अधिकारियों ने पाया कि डिग्रीटिंग चैंबर चोक (बंद) है । तीन एरिएशन टैंकों में से एक पूरी तरह से खराब था। विभाग ने जेई के साथ सहायक अभियंता को भी प्लांट में तैनात कर दिया। जबसे प्लांट में अफसरों की तैनाती की गई और उस के बाद से मौजूदा समय तक सीवरेज का स्लज मौके पर ही मौजूद है।
पहले भी गठित की गईं कमेटियां
2013 में जब शहर में पीलिया फैला था तो प्रदेश सरकार ने तुरंत आपातकालीन बैठक बुलाई थी और शहर में पीलिया के कारणों का पता लगाने को कहा था। कमेटी ने दो महीनों में रिपोर्ट तैयार कर दी, जिसमें मर्ज एरिया में घरों की सीवरेज लाइन के साथ कनेक्टीविटी का न होना और अश्वनी खड्ड में मलयाणा सीवरेज के पानी का मिलना दिखाया गया। रिपोर्ट के बाद जिम्मेदारी खत्म और समाधान कुछ नहीं।
जांच के दिए थे आदेश- 2014 में पीलिया फैलने के बाद नगर निगम ने उन घरों की जांच करने के आदेश दिए थे, जहां से सीवरेज खुले में बह रहा है। यह भी जांच करने के आदेश थे कि ठेकेदारों द्वारा जो मजदूर लेबर रखी गई है, उनके लिए शौचालय बनाने होंगे। नगर निगम ने 200 परिवारों को चिन्हित भी कर दिया था लेकिन जैसे ही दो तीन महीने का समय बीता सारी कार्रवाई ठंडे बस्ते में बंद हो गई।
साल 2016 में पीलिया के आंकड़ों ने तोड़ा रिकार्ड- सरकार के आंकड़ों पर गौर करें तो 2007 में शिमला शहर में पीलिया की चपेट में करीब 700 लोग आए थे और साल 2010 में 150 लोग इसका शिकार हुए। 2013 में 200 के करीब मामले सामने आए थे और साल 2014 में भी पीलिया रोग से ग्रस्त लोगों का आंकड़ा 100 से पार हुआ था।
लेकिन हकीकत में ऐसे मरीजों की संख्या इससे कहीं अधिक थी, जिनका कोई रिकार्ड नहीं है। नवंबर 2015 से शिमला में पीलिया ने अपने पांव फैलाने शुरू किए, जो अब तक काबू से बाहर है। इस साल शिमला शहर के लोगों में पीलिया रोग का सरकारी आंकड़ा एक हजार की संख्या पार कर चुका है। जबकि, हकीकत में रोगी हजारों में हैं।
भाजपा ही नहीं, कांग्रेस ने भी उठाए सवाल
राजधानी शिमला में पीलिया के बेकाबू होने पर विपक्ष में बैठी भाजपा ही नहीं, सत्तारूढ़ कांग्रेस ने भी सरकार पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। पीलिया पर समय रहते काबू नहीं पाने पर भाजपा ने जहां रविवार को कसुम्पटी में जोरदार प्रदर्शन किया वहीं, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य एवं प्रदेश कांग्रेस के पूर्व महासचिव कुलदीप सिंह राठौर ने अपनी ही सरकार पर सवाल उठा दिए हैं।
कहा कि शिमला में पीलिया के एक हजार नहीं, बल्कि पांच हजार से अधिक मामले हैं और प्रशासन पीलिया से निपटने में नाकाम रहा है। बहरहाल, पीलिया पर सियासत तेज है लेकिन, पीलिया के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं।
कसुम्पटी में भाजपा का धरना-प्रदर्शन- पीलिया के बढ़ते प्रकोप पर भाजपा कसुम्पटी मंडल ने रविवार को धरना-प्रदर्शन किया। साथ ही मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और नगर निगम के मेयर संजय चौहान और डिप्टी मेयर टिकेंद्र पंवर से इस्तीफे की मांग की है। शिमला में खासतौर पर कसुम्पटी विधानसभा क्षेत्र में पीलिया के लगातार बढ़ते प्रभाव के खिलाफ प्रदेश सरकार और नगर निगम शिमला के खिलाफ कसुम्पटी बस स्टैंड पर धरना प्रदर्शन किया।
इस दौरान प्रदर्शन में भाजपा के कार्यकर्ता और पदाधिकारी मौजूद रहे। कार्यकर्ताओं ने पीलिया पर अब तक नियंत्रण न पाने पर मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और नगर निगम शिमला के मेयर संजय चौहन और डिप्टी मेयर टिकेंद्र पंवर के इस्तीफे की मांग की। कसुम्पटी मंडल बीजेपी अध्यक्ष अमर सिंह ने कहा है कि शिमला में खासतौर पर कसुम्पटी एरिया में पीलिया का कहर है।
उन्होंने सरकार से मांग की है कि पीलिया से जिन मरीजों की मौत हुई है, सरकार उनके परिजनों को मुआवजा दे। भाजपा मेडिकल सेल के राज्य समन्वयक डा. एसएस मिन्हास ने प्रदर्शन के दौरान कहा कि पानी का रोजाना टेस्ट जरूरी है।
पानी के ट्रीटमेंट के बाद टेस्ट हो, उसके बाद स्टोरेज टैंक में टेस्ट हो और जब पानी सप्लाई किया जाना हो उस वक्त टेस्ट सबसे जरूरी है। टेस्ट हेपेटाइटिस के लिए नहीं बल्कि कॉलीफार्म के लिए हो। कॉलीफार्म पानी में होगा तो बीमारियां फैलेंगी।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य एवं प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व महासचिव कुलदीप सिंह राठौर ने पीलिया पर अपनी ही कांग्रेस सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा दिए हैं। पत्रकार वार्ता में उन्होंने कहा कि शिमला में पीलिया के हजार नहीं, बल्कि पांच हजार से अधिक मामले हैं। उन्होंने न्यायालय के आदेशों पर अमल न करने को कोर्ट की अवमानना करार दिया।
उन्होंने कहा कि शिमला में पीलिया पीड़ित लोगों का आंकड़ा कहीं अधिक है। यह सरकार की नाकामी है कि सीवरेज प्लांट पर हाईकोर्ट के आदेशों को नहीं माना गया और अवमानना की गई। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की ओर से पीलिया फैलने के लिए जिम्मेवार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई के आदेश जारी करने का स्वागत करते हुए कहा कि इस संबंध में आईपीसी की धाराओं के तहत आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बहुत से पीलिया पीड़ित लोग ऐसे हैं जो अपने रिश्तेदारों के पास शिमला आए थे या फिर बाहरी राज्यों से घूमने आए थे और अपने साथ पीलिया लेकर लौटे। कुलदीप सिंह राठौर ने कहा कि हिमाचल में एमसी, आईपीएच, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों की लापरवाही से ही ये गड़बड़ी हुई। ऐसे में एक अथारिटी ही ऐसी होनी चाहिए, जो शिमला में अकेले पानी का बंटवारा करे और उसी की जिम्मेदारी तय हो।