रेड डिलिशियस और रॉयल सेब किस्में अपना पोलीनेशन खुद नहीं कर पातीं, जबकि यही किस्में बाजार में सबसे अच्छे रेट पाती हैं। ऐसे में बाहरी प्रदेशों से लाई जाने वाली इटेलियन मधुमक्खियां या पहाड़ी मधुमक्खियां ही इनकी परागण प्रक्रिया में खूब सहायक होती हैं।
राज्य के बागवानी क्षेत्रों में मौसम ठंडा रहने के कारण यहां मधुमक्खियों का बड़े पैमाने पर बागवान खुद उत्पादन नहीं कर पाते हैं। ऐसे में हिमाचल के निचले गरम इलाकों से लाई जाने वाले मधुमक्खियां कम पड़ जाती है। नतीजतन बागवानों को बाहरी राज्यों का रुख करना पड़ता है।
प्रदेश के प्रख्यात बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एसपी भारद्वाज के अनुसार एपिस मेलिफेरा इटेलियन प्रजाति की हनी बी है। ये पहाड़ी मधुमक्खी से ज्यादा फुर्तीली है। दो से तीन सेकेंड में एक फूल पर जाती है। यह मक्खी एक मिनट में 25 से 30 फूलों पर पहुंच जाती है।
इसका सीधा लाभ परागण प्रक्रिया को मिलता है। एपिस सिरेना इंडिका देसी या पहाड़ी मधुमक्खी है। ये भारतीय मधुमक्खी तीन से चार सेकेंड में एक से दूसरे फल पर जाती है।
एक मिनट में 20 फूलों को पोलीनेट करती है। हालांकि पहाड़ी मधुमक्खियां बीमारियों से लड़ने की ज्यादा क्षमता रखती हैं, जबकि ये क्षमता इटेलियन मधुमक्खी में कम होती है।