छात्र अभिभावक मंच ने सरकार के निजी स्कूलों को पूरी फीस लेने के लिए अधिकृत करने के निर्णय को शर्मनाक करार दिया है। मंच ने सरकार से इस निर्णय को तुरंत वापस लेने की मांग की है। मंच के पदाधिकारियों ने सरकार से पूछा कि जब एक भी दिन स्कूल नहीं लगे तो अभिभावक पूरी फीस क्यों चुकाएं। संयोजक विजेंद्र मेहरा, सह संयोजक बिंदु जोशी, सदस्य विवेक कश्यप व फालमा चौहान ने कैबिनेट के निर्णय को छात्र और अभिभावक विरोधी बताया है। कहा कि इस निर्णय के बाद निजी स्कूलों ने छात्रों व अभिभावकों को मानसिक तौर पर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया है। निजी स्कूलों व संस्थानों ने मोबाइल पर मेसेज भेजने शुरू कर दिए हैं। मेसेज में उन्हें डराया धमकाया जा रहा है कि अगर पूरी फीस जमा न की गई तो छात्रों को न केवल संस्थानों से बाहर कर दिया जाएगा, बल्कि परीक्षाओं में भी नहीं बैठने दिया जाएगा। विजेंद्र मेहरा ने कहा कि शिमला के विंटर स्कूलों में फाइनल एग्जाम की डेटशीट व पाठ्यक्रम भी जारी हो चुका है।
एक भी दिन स्कूल नहीं लगे हैं। स्कूल का छात्रों पर कोई भी खर्चा नहीं हुआ है। उनके बिजली,पानी के बिल भी नाममात्र हैं। नियमित स्कूल न चलने से निजी स्कूल व संस्थान प्रबंधनों ने आधे अध्यापकों, कर्मचारियों, ड्राइवरों, सुरक्षा स्टाफ व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है। इन स्कूलों ने कुल फीस व चार्जेज के अस्सी प्रतिशत हिस्से को ट्यूशन फीस में परिवर्तित कर अभिभावकों से ज्यादातर फीस वसूल ली है। इसके विपरीत बच्चों की ऑनलाइन कक्षाओं के लिए नए मोबाइल व डेटा इस्तेमाल करने पर अभिभावकों पर हजारों रुपये का अतिरिक्त खर्चा बढ़ गया है। उन्होंने हैरानी जताई कि सरकार की कैबिनेट उच्च न्यायालय के एक निर्णय को आधार बनाकर निजी स्कूलों को खुली लूट की इजाजत दे रही है, जबकि इसी सरकार ने 27 अप्रैल 2016 को उच्च न्यायालय के निजी स्कूलों द्वारा वसूली जाने वाली ट्यूशन फीस के अलावा एडमिशन फीस, बिल्डिंग फंड, एनुअल चार्जेज व अन्य विविध फंडों पर लगाई गई रोक के निर्णय को लागू करने में पिछले चार वर्षों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।