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Drug Addiction: कहीं आपका बच्चा तो नहीं नशे का आदी...व्यवहार पर नजर जरूरी, बरतें ये सावधानियां

Thu, 14 Nov 2024 04:21 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला

सार

इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) के चिकित्सकों के मुताबिक समाज के सभी लोगों को मिलकर नशे से लड़ने की जरूरत है।
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अलख जगाओ, नशा भगाओ अभियान। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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चिट्टे का नशा जहर है और हमें अपने बच्चों को इस बारे में जागरूक करना होगा। इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) के चिकित्सकों के मुताबिक समाज के सभी लोगों को मिलकर नशे से लड़ने की जरूरत है। चिकित्सकों का कहना है कि आपके बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव नजर आ रहा है और उसने परिवार से दूर रहना शुरू कर दिया है तो सावधान हो जाएं। यह संकेत आपके बच्चे को नशे की लत लगने के हो सकते हैं। वर्तमान में चिट्टे से अपने बच्चों को बचाना अभिभावकों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।  डॉक्टरों की सलाह है कि अभिभावक अपने बच्चों की नियमित रूप से निगरानी करें। आईजीएमसी मनोरोग विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. निधि शर्मा ने बताया कि मनोरोग विभाग की ओपीडी में हर रोज 3 से 4 मरीज ऐसे पहुंच रहे हैं, जोकि चिट्टे के आदी हैं।

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15 साल के किशोर भी शामिल
चिंता की बात यह है कि इसमें 15 साल के किशोर भी शामिल हैं। 21 से 27 साल के युवाओं की संख्या इसमें सबसे अधिक है। चिकित्सकों के मुताबिक बच्चों को नशे से बचाने के लिए अभिभावकों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। अभिभावक इस बात को मानने को तैयार नहीं होते कि उनका बच्चा नशा नहीं कर सकता है, लेकिन जब उन्हें पता चलता है, तब तक बहुत देर हो जाती है। अभिभावक राज्य हेल्पलाइन नंबर 104 और टेली मानस सेवा के 14416 पर कॉल कर इस बारे में मदद ले सकते हैं। चिकित्सकों के मुताबिक नशा छोड़ने के पांच चरण होते हैं और इन सभी से गुजरते हुए कोई भी व्यक्ति इसे छोड़ सकता है। चिट्टे, भांग और अन्य नशों से जूझ रहे बच्चे के लिए डॉक्टरों की सलाह, मार्गदर्शन और दवाइयों की जरूरत होती है। मनोरोग विभाग ने ऐसे माता-पिता की मदद के लिए सहायता समूह का गठन किया है। इसमें अभिभावकों की काउंसलिंग की जाती है और ऑनलाइन मीटिंग के जरिये ऐसे माता-पिता एक दूसरे के साथ दुख साझा करते हैं। इससे उन्हें बच्चों को इस दलदल से बाहर निकालने की प्रेरणा मिलती है। 

लगातार जांच से ही मिलेगा नशे से छुटकारा  
चिकित्सकों के मुताबिक नशे को समाज में कलंक की तरह देखा जाता है। इस वजह से माता-पिता अपने बच्चों को अस्पताल ले जाने से घबराते हैं। कई बार ओपीडी में बच्चे अकेले आते हैं। ऐसे में यह बच्चे नियमित रूप से जांच नहीं करवाते और नशा छोड़ना मुश्किल हो जाता है। चिकित्सकों ने अभिभावकों से अपील की है कि नशा एक मनाेरोग है और इसको छोड़ने के लिए बच्चे को आपकी मदद तथा सहारे की जरूरत रहती है। बच्चा ओपीडी में तय तिथि पर नहीं आ रहा है तो माता-पिता को आना चाहिए जिससे कि डॉक्टर उन्हें गाइड कर सकें। पूरी तरह से नशा छाेड़ने के लिए डेढ़ से दो साल तक का समय लग सकता है। 

 

 नशा करने वालों के लक्षण 
  • व्यवहार में बदलाव आना  
  • परिवार के सदस्यों से दूर-दूर रहना 
  • पढ़ाई में कमजोर होना 
  • घर देरी से या जल्दी आना 
  • नाखून जले हुए या काले तो नहीं 
  • बेहोश या अचेत अवस्था में 
  • पहुंच जाना
  • बच्चों का कमजोर होना और हमेशा सुस्त रहना

 यह सावधानियां बरतें 
  • अपने बच्चों की नियमित रूप से निगरानी करें 
  • जेबों, कमरे और अलमारी की जांच करें कहीं उसमें पेपर, फॉयल पेपर तो नहीं 
  • बच्चे को पैसे कम दें और उसकी संगत का भी रखें ध्यान
  • स्कूल के बच्चों को बताएं कि यह नशा एक जहर है, पाउडर की तरह दिखता है, इसे न लें   
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क्या कहते हैं विशेषज्ञ
चिट्टे का नशा समाज के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। अभिभावकों से आग्रह है कि इसका पता चलने पर फौरन बच्चे को अस्पताल लेकर आएं। मरीज की नियमित जांच और दवाइयों की मदद से नशा छोड़ा जा सकता है। अगर बच्चा ओपीडी में नहीं आ रहा है तो भी अभिभावक जरूर आएं ताकि इलाज में बाधा न हो। -डॉ. निधि शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर, मनोरोग विभाग, आईजीएमसी
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