जमीन खरीद मामले में विवादों में आए जयराम सरकार के कैबिनेट मंत्री के खिलाफ विजिलेंस की प्रारंभिक जांच पूरी हो गई है, जिसमें कई अनियमितताएं सामने आई हैं। जांच में पता चला है कि जमीन खरीद के लिए सरकार के सारे नियम धता बताते हुए सौदे किए गए। प्रदेश में लैंड होल्डिंग को लेकर बने 1971 के हिमाचल प्रदेश सीलिंग ऑन लैंड होल्डिंग एक्ट के अनुसार एक परिवार के पास सामान्य क्षेत्र में 150 बीघा से ज्यादा जमीन नहीं हो सकती। इसमें कई मानकों को आधार बनाकर अलग-अलग लैंड होल्डिंग की अनुमति दी गई है। विजिलेंस ने जांच पूरी कर सरकार को सौंप दी है, अब कार्रवाई के लिए गेंद सरकार के पाले में है।
सूत्रों के अनुसार जांच में मंत्री के पास अनुमति से कई गुना ज्यादा जमीन होने की पुष्टि हुई है। करोड़ों की जमीन को रिश्तेदारों के नाम दर्ज कराने में भी सरकार को भारी वित्तीय नुकसान पहुंचाया गया है। जमीन का कई गुना कम दाम पर सौदा किया। इससे सरकार को सेल डीड के लिए स्टांप एक्ट के तहत लगने वाले स्टांप ड्यूटी और पंजीकरण फीस से मिलने वाले राजस्व का नुकसान हुआ है। ब्यूरो की जांच में सामने आए तथ्यों के बाद अब सरकार मंथन में जुटी हुई है। चूंकि विजिलेंस की नियमित जांच या एफआईआर न कराने पर सरकार को आने वाले मानसून सत्र में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है, ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार सत्र से पहले ही मंत्री के भविष्य पर फैसला ले सकती है।
केंद्रीय नेतृत्व को बताए लैंड होल्डिंग के नियम
सूत्रों ने बताया कि जमीन खरीद मामले में फंसे मंत्री के दिल्ली जाने के दो दिन बाद अचानक प्रदेश के राजस्व मंत्री महेंद्र सिंह भी दिल्ली रवाना हुए थे। चूंकि सिंह ने विवाद के बीच कुछ दिन पहले ही राजस्व विभाग के अधिकारियों से लैंड सीलिंग समेत विभिन्न मुद्दों पर जानकारी ली थी। ऐसे में इसके बाद दिल्ली में हुई मंत्री व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की मुलाकात को इसी विषय से जोड़कर देखा जा रहा था।
आसान नहीं मामले को लटकाना
जानकारों का कहना है कि चूंकि मंत्री के खिलाफ कांगड़ा के एक व्यक्ति ने प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय और विजिलेंस तक शिकायत की थी, ऐसे में सरकार के लिए इसे लटकाए रखना आसान नहीं होगा।