1650 में शुरू हुआ था दशहरा
इतिहास के अनुसार 1650 में तत्कालीन राजा जगत सिंह ने कुल्लू दशहरे का आगाज किया था और उन्होंने अपना राजपाठ रघुनाथ के चरणों में समर्पित कर दिया था। खुद भगवान रघुनाथ के छड़ीबरदार के रूप में सेवा करने का संकल्प लिया। आज भी जगत सिंह के वंशज बखूबी इस रस्म को निभा रहे हैं। बताया जाता है कि भगवान रघुनाथ का आशीष लेने से राजा जगत सिंह का ब्रह्महत्या का दोष धुल गया था। भगवान रघुनाथ की प्रतिमा को सबसे पहले धार्मिक नगरी मणिकर्ण में रखा था। 1651 में रघुनाथ, सीता और हनुमान की मूर्तियों को अयोध्या से दामोदर दास लाकर राजा के आदेश के अनुसार धार्मिक तीर्थ स्थल मणिकर्ण में रखा गया था। ऐसी मान्यता है कि दशहरा का पहला आयोजन मणिकर्ण में आयोजित किया गया।
गोलीकांड से बंद हो गया था दशहरा उत्सव
वर्ष 1660 में तत्कालीन राजा जगत सिंह ने विधि विधान के अनुसार कुल्लू के सुल्तानपुर में रघुनाथ की नगरी में स्थापित किया और कुल्लू दशहरा का सफर भी आरंभ हुआ। वर्ष 1971 में कुल्लू दशहरा में गोलीकांड हुआ था। इस दौरान दशहरा उत्सव में भगदड़ मच गई थी और श्यामा नाम के व्यक्ति की गोली की चपेट आने से मौत हुई थी। इसका लोकगीत आज भी गूंजता है। गोलीकांड के कारण 1972-73 में कुल्लू का दशहरा भी नहीं मनाया गया था। वर्ष 1978 में कुल्लू दशहरा तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह ने दोबारा मनाना शुरू किया। हर साल एक हफ्ते तक मनाए जाने वाले उत्सव में सैकड़ों देवी देवताओं के आने से भगवान रघुनाथ की नगरी स्वर्ग लोक में तब्दील हो जाती है। इसके लिए देव समाज एक माह पहले से ही तैयारी शुरू कर देता है। झारी, धड़छ, घंटी, शहनाई, ढोल-नगाड़े, करनाल व नरसिंगों की स्वरलहरियों से ढालपुर का नजारा देवमय हो जाता है। देशी-विदेशी पर्यटक भी इस शानदार व अलौकिक दृश्य को अपने कैमरे में कैद करते हैं। दशहरा में आने वाले सैकड़ों देवी देवताओं के मुख्य कारकून व देवलु दशहरा उत्सव के सात दिनों तक अस्थायी शिविरों में तपस्वियों की तरह जीवन यापन करेंगे। देवी देवताओं के कड़े नियमों से बंधे होने के कारण देवता के कारकून अस्थायी शिविरों से बाहर नहीं जा सकते और वह चाय व खाना भी बाहर नहीं खा सकते।
200 देवी-देवता अपने अस्थायी शिविरों में पहुंचते हैं कई देवता
इस बार बंजार घाटी के अधिष्ठाता देवता बालू नाग अपनी कोठी से दशहरा को निकल गए हैं। इसके अलावा रघुपुर घाटी के देव व्यास ऋषि भी 150 किमी का सफर कर कुल्लू पहुंचेंगे। सैंज घाटी से मनु ऋषि के साथ कई देवता भी निकल चुके हैं। इसके अलावा बाह्य सराज के देवता खुडीजल, शमशरी महादेव, जोगेश्वर महादेव, कुईकंडा नाग, कोट पझारी सहित टकरासी नाग ने बंजार से आगे निकल कर आधा सफर पैदल तय कर दिया है। माता हिडिंबा और बिजली महादेव एक अक्तूबर को अपने देवालयों से रवाना होंगे। अनुसार मंगलवार को जिले से ढोल-नगाड़ों की थाप पर रघुनाथ से मिलने के लिए करीब 100 देवी-देवता निकल गए हैं। बालू नाग शाम को मंडी जिले के औट पहुंचे और बुधवार को टिकरा बावड़ी में रुकेंगे। उत्सव में सबसे दूर 150 से 200 किमी की दूरी से आने वाले बाह्य सराज के देवता खुडीजल महाराज और टकरासीर नाग का दूसरा पड़ाव मंडी जिले के टकोली में होगा और एक अक्तूबर शाम को ढालपुर में अपने अस्थायी शिविर में पहुंचेंगे। देवता व्यास ऋषि मंदिर कुंईर देर शाम को बालीचौकी पहुंचे। देवता कोट भझारी जिला मुख्यालय से पांच किमी दूर मोहल पहुंच गए हैं। सोने-चांदी से सजे देव रथों का जगह-जगह स्वागत किया जा रहा है। लोगों की ओर से रास्ते में खुले मन से देवी-देवताओं का स्वागत कर रहने और खाने की व्यवस्था की जा रही है। जिला देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर ने कहा कि एक अक्तूबर शाम तक कुल्लू में 150 से 200 देवी-देवता अपने अस्थायी शिविरों में पहुंचेंगे।
राज परिवार की दादी देवी हिडिंबा हारियानों-कारकूनों केहुईं रवाना
दशहरा उत्सव में भाग लेने के लिए कुल्लू राज परिवार की दादी देवी हिडिंबा बुधवार सुबह कुल्लू के लिए रवाना हुईं। ढुंगरी स्थित हिडिंबा मंदिर से देवी की भव्य रथयात्रा निकली गई। देवी-देवताओं का महाकुंभ अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव 2 से 8 अक्तूबर तक मनाया जाएगा। उत्सव में लोगों के लिए देवताओं के दर्शन के साथ मनोरंजन का भी पूरा प्रबंध किया गया है। दशहरा उत्सव की सदियों पुरानी देव परंपरा का निर्वहन करने के लिए ढुंगरी गांव स्थित हिडिंबा मंदिर से देवी की ऐतिहासिक रथ यात्रा शुरू हुई। पूजा-अर्चना के बाद सैकड़ों हारियानों और कारकून रथयात्रा के साथ निकले। रथ में विराजमान देवी हिडिंबा और महर्षि मनु जहां से गुजरे, वहां दर्शन के लिए भक्तों की लंबी लाइनें लग गईं। जगह-जगह प्रसाद भी वितरित किया। गुरुवार को देवी के रघुनाथ मंदिर पहुंचते ही उत्सव का आगाज हो जाएगा। मान्यता है कि देवी के बिना दशहरा उत्सव का आगाज नहीं होता। कुल्लू घाटी में दशहरे के पर्व का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है। देवी हिडिंबा का इस उत्सव में विशेष महत्व है। दशहरा देवी हिडिंबा के आगमन के बाद ही शुरू होता है।
सात दिन तक चलने वाले उत्सव के दौरान देवी कुल्लू स्थित अस्थायी शिविर में रहेंगी। पहले दिन देवी हिडिंबा का रथ कुल्लू के अधिष्ठाता भगवान रघुनाथ मंदिर और कुल्लू राजमहल पहुंचेगा। राज परिवार की ओर से यहां बाकायदा अश्व पूजा होगी। सात दिन तक अस्थायी शिविर में रहने के बाद अंतिम दिन लंका दहन के बाद ही देवी वापस आएंगी। हिडिंबा माता के गुर देवी चंद ने बताया कि माता आज रात कुल्लू पहुंचेंगी और सुबह देवी का स्वागत होगा। रामशिला में देवी हिडिंबा को निमंत्रण देने के लिए छड़ी आएगी। यहां से देवी भगवान रघुनाथ के मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगी। देवी हिडिंबा के अलावा ऊझी घाटी से दर्जनों देवी-देवता दशहरा में भाग लेने के लिए आज ही रवाना हुए। गौशाल गांव से गौतम ऋषि और तक्षक नाग, नसोगी से शंख नारायण, चचोगा-अलेउ से सृष्टि नारायण सहित कई देवी-देवता उत्सव में भाग लेंगे। सभी देवता आज ही रवाना हुए हैं।