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खून जमा देने वाली ठंड में कभी ढाबे में बर्तन धोती थी कविता

Tue, 21 Aug 2018 11:53 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मनाली/पतलीकूहल
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ये वो जुनून था जो कविता ठाकुर के बचपन से सिर चढ़ कर घूम रहा था। हालात विपरीत थे। अंतरराष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी कविता ठाकुर का बचपन बेहद गरीबी में बीता है। माता और पिता मनाली के जगतसुख में छोटा सा ढाबा चलाते थे। आमदनी उतनी नहीं थी।

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खेलने कूदने की उम्र में कविता हाड़ कंपा देने वाली ठंड में ढाबे पर जूठन साफ करती थी बर्तन धोती थी। तन पर गर्म कपड़े नहीं होते थे। ढाबे में ही परिवार सोता था। सर्दियों में अंदर कोई हीटिंग सिस्टम नहीं था। कंबल से काम चलाना पड़ता था।

इन हालातों से पार पाते हुए कविता ने न सिर्फ  गरीबी की जंजीरों को तोड़ा बल्कि अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय टीम की नुमाइंदगी भी कर रहीं हैं। कविता ने कबड्डी खेल ही क्यों चुना, ये भी रोचक है। कबड्डी सबसे सस्ता खेल माना जाता है।
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स्कूल में दाखिला लेते ही कविता ने ठान लिया कि कबड्डी में कॅरियर बनाना है। स्कूल में कविता ने कबड्डी से अच्छी खासी पहचान बना ली। 2009 में धर्मशाला स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) में कविता का दाखिला हो गया। यहां से कविता ने फिर पीछे पलटकर नहीं देखा। 

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एक समय बीमारी से दांव पर लग गया कॅरियर

हालांकि, एक समय ऐसा भी आया जब कविता का कॅरियर बीमारी के कारण दांव पर लग गया। चिकित्सकों ने छह माह आराम करने की सलाह दी। खुद कविता ठाकुर को भी लगने लगा था कि उनका कॅरियर खत्म हो गया।

मगर इन्होंने फिर वापसी की। 2014 में हुए एशियाई खेलों में भारतीय टीम में स्थान बनाया। टीम चैंपियन बनी और इसी जीत ने कविता के साथ-साथ पूरे परिवार की किस्मत पलट दी। 
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घर पहुंचकर अभी भी ढाबे में काम करती है कविता

गोल्ड मेडल जीतने के बाद सरकार की ध्यान कविता की ओर गया। जिन माता-पिता ने पूरी जिंदगी एक छोटे से ढाबे में रहकर गुजार दी। अब कविता की कबड्डी ने मनाली शहर में पहुंचा दिया। मकान जरूर किराए का है, लेकिन अब जीवन उतना कठिन नहीं रहा। 

मां कृष्णा ठाकुर भावुक होकर कहती हैं कि कविता की बदौलत अब पक्के मकान में रह रहे हैं। अब देश के लिए और मेडल लाए यही उम्मीद है। कविता अब भी पहले की तरह मनाली में होने पर ढाबे में ही काम करती हैं। 
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