हालांकि, एक समय ऐसा भी आया जब कविता का कॅरियर बीमारी के कारण दांव पर लग गया। चिकित्सकों ने छह माह आराम करने की सलाह दी। खुद कविता ठाकुर को भी लगने लगा था कि उनका कॅरियर खत्म हो गया।
मगर इन्होंने फिर वापसी की। 2014 में हुए एशियाई खेलों में भारतीय टीम में स्थान बनाया। टीम चैंपियन बनी और इसी जीत ने कविता के साथ-साथ पूरे परिवार की किस्मत पलट दी।
गोल्ड मेडल जीतने के बाद सरकार की ध्यान कविता की ओर गया। जिन माता-पिता ने पूरी जिंदगी एक छोटे से ढाबे में रहकर गुजार दी। अब कविता की कबड्डी ने मनाली शहर में पहुंचा दिया। मकान जरूर किराए का है, लेकिन अब जीवन उतना कठिन नहीं रहा।
मां कृष्णा ठाकुर भावुक होकर कहती हैं कि कविता की बदौलत अब पक्के मकान में रह रहे हैं। अब देश के लिए और मेडल लाए यही उम्मीद है। कविता अब भी पहले की तरह मनाली में होने पर ढाबे में ही काम करती हैं।