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कुल्लू दशहरा: प्रतिष्ठित देवताओं से मिलने से पहले लिया जाता है समय, देवता भी सुनाते हैं अपना दुखड़ा

Mon, 22 Oct 2018 12:39 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कुल्लू
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अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव देव-मानस के लिए ही नहीं, देवताओं के मिलन के लिए भी जाना जाता है। दशहरा उत्सव में प्रतिष्ठित देवताओं से उनके शिविरों में मिलने के लिए घाटी के देवी-देवता भी आ रहे हैं। देव मिलने के भी अपने नियम होते हैं। बड़े देवताओं से मिलने से पहले बाकायदा समय लिया जाता है। यहां तक देवता अपना दुखड़ा भी सुनाते हैं। कई देवताओं का साल बाद यहीं दशहरे में मिलन होता है। शिविरों में देवताओं से आशीर्वाद लेने भी लोग बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। 

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रविवार को बंजार के देवताओं ने जिला के सबसे अमीर देवी देवताओं में शुमार बाह्य सराज आनी के देवता खुड़ीजल के शिविर में आकर भव्य देव मिलन किया। ढोल नगाड़ों की थाप पर देवी-देवता दूसरे शिविरों में जाकर मिलन कर रहे हैं। ढालपुर स्कूल, एसपी कार्यालय के आगे, कलाकेंद्र, जिला लाइब्रेरी, ढालपुर मैदान आदि जगहों पर विराजमान देवी-देवता भी मानस की भांति एक दूसरे मिलकर अपना दुखड़ा सुना रहे हैं। कई देवी देवताओं ने दूसरे देवताओं से मिलने के लिए समय भी मांगा। देवी हिडिंबा, मनु ऋषि, खुड़ीजल, टकरासी नाग, ब्यास ऋषि, कोट पझारी, बिजली महादेव आदि देवताओं के शिविरों में आकर देव मिलन हो रहा है। 

जिला देवी देवता कारदार संघ के पूर्व प्रधान दोत राम ठाकुर ने कहा कि यह देव मिलन की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इससे न केवल देव समाज को लाभ मिलता है बल्कि लोगों को भी एक दूसरे जानने का अवसर मिलता है। देव खुड़ीजल के कारदार शेर सिंह ने कहा कि रविवार को बंजार घाटी के दो देवरथों ने खुड़ीजल में आकर देव मिलन किया है। कारकूनों द्वारा स्वागत कर खुडीजल की ओर से शॉल भेंट की है।

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देवी भागासिद्ध ने किया बहन दशमी वारदा से मिलन

देवी देवताओं के महाकुंभ दशहरा उत्सव में एक साल बाद दो बहनों का मिलन देख देवलु भावुक हो गए। रविवार को नरोगी की माता भागासिद्ध अपने देवलुओं के साथ बहन दशमी वारदा के अस्थायी शिविर में पहुंची। माता के साथ देवता खोडू भी साथ थे। इसके बाद माता दशमी वारदा और देवता ब्रिंडू के रथ को शिविर से बाहर निकाला गया।

माता भागासिद्ध और दशमी वारदा दोनों बहनों का भव्य देव मिलन हुआ। एक साल बाद हुए भव्य देव मिलन को देखकर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। माता दशमी वारदा ने गूर के माध्यम से कहा कि कलियुग में आदमी अपने नियमों को भूल चुका है, लेकिन हम सतयुग के देवता हैं जो पहले भी ऐसे थे और आज भी ऐसे हैं। माता भागासिद्ध के पुजारी मोहर सिंह ठाकुर ने कहा कि दशहरे में हर साल दोनों देवियों का मिलन होता है।
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शाही ठाठ के साथ निकली नरसिंह भगवान की जलेब

दशहरा उत्सव के तीसरे दिन भगवान नरसिंह ने ढालपुर में रक्षा सूत्र बांधा और राजा की चानणी से नरसिंह भगवान की शाही अंदाज में छह देवी-देवताओं की मौजूदगी में दूसरी भव्य जलेब निकली। जलेब में ढोल नगाड़ों की थाप पर देवताओं संग देवलु भी झूमे। नरसिंह भगवान की दूसरी जलेब में जिला कुल्लू के आराध्य देवता रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह भी पालकी में सवार हुए। जलेब में सैंज घाटी के देवी देवता शामिल हुए।

शाम साढ़े चार बजे सैंज वैली में सैंज के लक्ष्मी नारायण, माता आशापुरी, शैंशर के देवता मनु ऋषि, बनोगी देहुरी के देवता पुंडरिक ऋषि, करथा नाग, वासुकी नाग देवलुओं के साथ राजा की चानणी के पास इकट्ठा हुए। इसके बाद नरसिंह भगवान की घोड़ी आगे चली।

इसके पीछे जलेब का काफिला चला। मोहल्ला उत्सव होने तक प्रतिदिन कुल्लू दशहरा में जलेब निकाली जाएगी। मान्यता यह है कि आसुरी शक्तियों का प्रभाव दशहरा में सम्मलित हुए देव समाज पर न हो, इसलिए भगवान नरसिंह की जलेब के माध्यम से सुरक्षा घेरा बांधते हैं। इससे दशहरा शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न होता है।
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