दस्तावेजों के मुताबिक व्यक्ति की जन्म तिथि 25 जनवरी 1955 थी, जबकि पंचायत प्रतिनिधियों ने सरकारी दस्तावेजों के साथ छेड़छाड कर सर्टिफिकेट में 1944 दर्शाई थी।
इसके साथ ही एक अन्य महिला को बुढ़ापा पेंशन मुहैया करवाने के लिए पंचायत की ओर से प्रमाण पत्र जारी किया गया। इस मामले में हमीरपुर न्यायालय में 25 गवाह पेश हुए। अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलों को सुनने के बाद विशेष न्यायाधीश राकेश कैंथला ने पूर्व प्रधान और पंचायत सचिव को दोषी पाया।
जिला न्यायवादी चंद्रशेखर भाटिया ने अदालत के आदेश की जानकारी देते हुए बताया कि अदालत ने दो-दो साल के कठोर कारावास और पांच-पांच हजार रुपये जुर्माना की सजा सुनाई गई है।