अलग तरह की भूमि, मौसम और ऊंचाई के लिए बेहतर सैटेलाइट और तस्वीर के लिए तकनीक विकसित की जा रही है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के शोधार्थी इस पर काम कर रहे हैं। शोधार्थियों का दावा है कि विश्व में पहली बार इस तरह की तकनीक विकसित की जा रही है। तकनीक विकसित होने पर अलग-अलग भूमि, मौसम व ऊंचाई के लिए बेहतर सैटेलाइट का चयन करते हुए बेहतर परिणाम मिल सकेंगे। एस मैप सैटेलाइट से कृषि भूमि की बेहतर तस्वीर सामने आई है।
यह शोध कार्य बल्ह क्षेत्र में चल रहा है। वर्तमान में हर तरह की भूमि यानी कृषि, वन, घास, हर तरह के मौसम यानी सर्दी, गर्मी, बरसात व ऊंचाई के लिए एक तरह के सैटेलाइट से काम हो रहा है। जबकि वास्तविकता में धरातल में यह सब अलग-अलग हैं। शोध में यह स्पष्टता लाई जा रही है कि कौन सैटेलाइट कौन सी जगह काम करेगा, जिससे बेहतर परिणाम के साथ बेहतर तस्वीर मिल सकें।
यह शोध कार्य वर्ष 2021 से शुरू किया गया है और दिसंबर 2023 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस शोध में स्पेशियल रेजोलेशन का स्केल डाउन करके फील्ड स्तर पर बराबर लाया जा रहा है। पता लगाया जा रहा है कि कौन सी सैटेलाइट किस मौसम, किस भूमि पर बेहतर काम करेगा। उसे उस भूमि के लिए इस्तेमाल में लाया जाएगा। फील्ड पर किए गए काम से इसकी तुलना की जा रही है। गणित के फार्मूले अपनाते हुए तकनीक विकसित की जाएगी।
यह होगा फायदा
इस तरह की तकनीक विकसित होने से कृषि संबंधी कार्य में और बेहतर चीजें की जा सकेंगी। अलग ऊंचाई वाली कृषि भूमि को लेकर काम किया जा सकेगा। वन भूमि हो या कोई विशेष मौसम, उसमें सही तरीके से काम होगा। आईआईटी मंडी के शोधार्थी साहिल ने बताया कि इस तकनीक के लिए काम चल रहा है। कृषि भूमि के लिए तकनीक दो या तीन महीने में तैयार होने की उम्मीद है। उम्मीद है कि पूरा शोध कार्य इसी साल पूरा होगा।
विश्व में इस तरह की तकनीक पर पहले किसी का ध्यान ही नहीं दिया। छात्र साहिल इस तकनीक के लिए कार्य कर रहे हैं। इस तकनीक के बनने से बेहतर परिणाम सामने आएंगे। अलग-अलग भूमि, मौसम व ऊंचाई के लिए अलग-अलग सैटेलाइट का चयन कर बेहतर चीजें की जा सकेंगी। यह वास्तविकता के काफी पास होंगी।
- डॉ. दीपक स्वामी, शोधार्थी के गाइड व एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईटी मंडी