केवल एक दिन हड़ताल व एक दिन दीपावली की रात को ही वह अपने घर गए। शेष रातें उन्होंने बसों की सीटों पर सोकर ही गुजार दीं। यहां तक कि निगम के आग्रह के बावजूद भी उन्होंने छुट्टी जाने की बजाय अपने 303 रविवारीय अवकाश निगम को दान करवा दिए।
लेकिन, अभी भी उनके पास करीब 550 रविवार की छुट्टियां शेष बची हैं। ईमानदारी दिखाने व निगम का घाटा दूर करने के लिए जोगिंद्र सिंह को वर्ष 2011 में निगम ने भी प्रशंसा पत्र व नकद पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
उधर, जोगिंद्र सिंह का कहना है कि 28 जून की शाम को होने वाले सम्मान समारोह में भी वह खुद नहीं जा पाएंगे। 3 घंटे की छुट्टी ली तो उनका प्रण टूट जाएगा। लिहाजा, वह सम्मान लेने के लिए अपने पिता को सुंदर सिंह को भेजेंगे।