रणसिंघा, करनाल, ढोल और नगाड़ा है सिराज के प्रमुख वाद्य यंत्र
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला के इतिहास विभाग में लोक वाद्य यंत्रों और उनके संस्कृति तथा समाज पर प्रभाव को लेकर अध्ययन किया जाएगा। प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान के मेरु घटक के तहत परियोजना के लिए शोध सहायक या शोध अन्वेषक की नियुक्ति की जा रही है। परियोजना का संचालन इतिहास विभाग के डॉ. विनय कुमार शर्मा के निर्देशन में होगा। सिराज घाटी के प्रमुख वाद्य यंत्र शहनाई, रणसिंघा, करनाल, ढोल और नगाड़ा है।
अध्ययन में सिराज घाटी में प्रचलित लोक वाद्य यंत्रों और उनसे जुड़ी संगीत परंपराओं पर शोध होगा। इसके साथ इन वाद्य यंत्रों की स्थानीय संस्कृति और सामाजिक जीवन में भूमिका का अध्ययन किया जाएगा। परियोजना में क्षेत्रीय कार्य को अहम हिस्सा बनाया गया है। शोधकर्ता क्षेत्र में जाकर लोक परंपराओं से जुड़ी जानकारी जुटाएगा और उसका शैक्षणिक दस्तावेज तैयार करेगा। परियोजना की अवधि तीन माह रखी है। इसके लिए एक लाख रुपये का बजट तय है। चयनित शोध सहायक या अन्वेषक को बजट की अधिकतम 35 प्रतिशत राशि तक मानदेय दिया जाएगा। पद परियोजना आधारित होगा।
आवेदन के लिए संगीत या इतिहास में न्यूनतम 55 प्रतिशत अंकों के साथ स्नातकोत्तर डिग्री और नेट अनिवार्य है। शैक्षणिक लेखन और क्षेत्रीय कार्य का अनुभव वांछनीय योग्यता में रखा है। इच्छुक अभ्यर्थियों का वॉक-इन साक्षात्कार 5 अक्तूबर को दोपहर तीन बजे इतिहास विभाग में होगा। अभ्यर्थियों को मूल प्रमाणपत्र, उनकी प्रतियां और दो पासपोर्ट आकार के फोटो लाने होंगे।
परियोजना में इसका होगा आकलन
सिराज घाटी के लोक वाद्य यंत्रों को अध्ययन का केंद्र बनाया है। शोध के दौरान क्षेत्र में प्रचलित वाद्य यंत्रों, उनके इस्तेमाल और उनसे जुड़ी लोक संगीत परंपराओं की जानकारी जुटाई जाएगी। इसके साथ यह देखा जाएगा कि इन वाद्य यंत्रों का स्थानीय संस्कृति और सामाजिक जीवन से क्या संबंध है। क्षेत्रीय कार्य के माध्यम से संबंधित जानकारी और सामग्री एकत्र की जाएगी। परियोजना के तहत तैयार सामग्री से सिराज घाटी की लोक संगीत परंपरा और उससे जुड़े सांस्कृतिक पक्षों का शोध आधारित दस्तावेज तैयार किया जाएगा।