हिमाचल प्रदेश जैविक विविधता अधिनियम 2002 के कार्यान्वयन नहीं करने को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। अदालत ने जैविक बोर्ड के सदस्य सचिव को अदालत के समक्ष तलब किया है। अदालत ने सचिव से पूछा है कि अधिनियम की धारा 23 और 24 में राज्य जैव विविधता बोर्ड से अनुमति लेने पर दोषी कंपनियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है। मामले की सुनवाई 13 जुलाई को निर्धारित की गई है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सदस्य सचिव से पूछा है कि दोषी कंपनियों के खिलाफ अधिनियम की धारा 55 (2) में कार्रवाई क्यों नहीं की गई है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि यदि कोई कंपनी जैविक संसाधनों को बिना स्वीकृति से इस्तेमाल करती है तो उस स्थिति में अधिनियम की धारा 56 में एक लाख रुपये जुर्माने की सजा का प्रावधान है।
याचिकाकर्ता ने अदालत को सुझाव दिया था कि राज्य सरकार की ओर से दिए जाने वाले नोटिस में ये सारे आदेश होने चाहिए। संबंधित कंपनियों को आदेश दिए जाए कि प्रदेश के जैविक संसाधनों का इस्तेमाल करने के लिए राज्य जैव विविधता बोर्ड से स्वीकृति ली जाए। अदालत ने सरकार को बाकी सुझावों की अनुपालना करने के आदेश दिए थे। पीपल फॉर रिस्पांसिबल गोर्वनैंस ने जैविक विविधता अधिनियम 2002 के कार्यान्वयन के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। आरोप लगाया गया है कि राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने में पूरी तरह से विफल रही है। यह अधिनियम राज्य को स्वयं के जैविक संसाधनों का उपयोग करने के लिए उनके संप्रभु अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है। अधिनियम ने जैव संसाधनों तक पहुंच और विनियमित करने के लिए त्रिस्तरीय संरचना का प्रावधान किया गया है। इसमें राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्ड और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियों का गठन किया गया है।