याचिकाकर्ताओं को सितंबर 2023 में मिली थी नियुक्ति
याचिकाकर्ताओं को सितंबर 2023 में नियमित नियुक्ति मिली थी। सितंबर 2025 में दो साल का सफल कार्यकाल पूरा करने के बाद भी याचिकाकर्ता को 20,200 के बेसिक पे पर ही रखा गया और 30,500 का लाभ देने से मना कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उच्च न्यायालय पहले ही मोहित शर्मा बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले में यह व्यवस्था दे चुका है कि तीन जनवरी 2022 के बाद नियमित हुए कर्मचारियों को केवल नियुक्ति की तारीख के आधार पर इस लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। बताया गया कि समान पद और समान दायित्वों के बावजूद यह अधिसूचना एक ही कैडर में दो अलग-अलग वेतन संरचनाएं बनाकर असमानता का व्यवहार करती है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि नियम 7 ए के उस हिस्से को रद्द किया जाए या फिर उसका दायरा बढ़ाकर 3 जनवरी 2022 के बाद नियुक्त उन सभी कर्मचारियों पर लागू किया जाए, जिन्होंने 2 साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है। इसके साथ ही 4 अप्रैल 2026 की इस भेदभावपूर्ण अधिसूचना, स्पष्टीकरण को निरस्त किया जाए। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं का वेतन लेवल-3 के तहत 2 साल पूरा होने की तिथि से 30,500 पर तय करने और पिछला बकाया ब्याज सहित जारी करने का आदेश दिया जाए।
एलपीजी एजेंसी निलंबित होने से हो रही असुविधा पर मांगी स्टेटस रिपोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने तहसील नालागढ़ के गांव राजपुरा की निवासी बिमला देवी की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उपभोक्ताओं को एलपीजी एजेंसी निलंबित होने की वजह से हो रही भारी असुविधा पर कड़ा संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किए हैं। अदालत ने केंद्र और संबंधित पक्षों को निर्देश जारी किया है कि वे अगली सुनवाई से पहले स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर यह स्पष्ट करें कि एजेंसी निलंबित होने के बाद उपभोक्ताओं के लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्थाएं बनाई गई हैं। मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी। अदालत को बताया कि 31 मार्च 2026 को एलपीजी एजेंसी का डीलरशिप समझौता निलंबित कर दिया गया था। इसके बाद से नालागढ़ के वार्ड नंबर 5 और आसपास के क्षेत्रों में रसोई गैस की निर्बाध आपूर्ति ठप हो गई है। स्थानीय डीलरशिप बंद होने के कारण उपभोक्ताओं को रसोई गैस सिलेंडर प्राप्त करने के लिए 8 से 10 किलोमीटर दूर दूसरी एजेंसियों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। इससे क्षेत्र के लोगों को भारी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
बाखली खड्ड पुल निर्माण मामला, हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
प्रदेश हाईकोर्ट ने लंबाथाच-कलहणी-पंडोह मार्ग पर बाखली खड्ड पर बनने वाले मोटर योग्य पुल के निर्माण और इसकी वर्तमान स्थिति को लेकर राज्य सरकार को नोटिस जारी कर स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने राज्य सरकार को इस मामले में स्पष्ट जानकारी मांगी है कि स्वीकृत बजट की वर्तमान स्थिति क्या है और प्रशासनिक मंजूरी के बाद क्या कोई टेंडर जारी किया गया है। मामले की अगली सुनवाई दो सितंबर को होगी। अदालत ने यह आदेश सुषमा और अन्य की ओर से दायर जनहित याचिका पर दिए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को अवगत कराया कि बाखली खड्ड पर पुल निर्माण के लिए 31 मार्च 2026 को 22 करोड़ रुपये की प्रशासनिक मंजूरी दी जा चुकी है। अदालत को तस्वीरों और दस्तावेजों के माध्यम से अवगत करवाया गया कि बाढ़ में पुराना पुल क्षतिग्रस्त होने की वजह से क्षेत्र की 12 से 15 पंचायतों का मुख्य मार्ग से संपर्क पूरी तरह कट चुका है। वर्तमान में आने जाने के लिए केवल एक अस्थायी पैदल पुल उपलब्ध है।
15 साल पुराने वाहनों पर रोक केवल स्कूलों के लिए या सभी शिक्षण संस्थानों पर लागू, राज्य सरकार से जवाब तलब
प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है कि वाहनों के लिए 15 साल की अधिकतम आयु सीमा का नियम केवल स्कूलों तक सीमित है या फिर यह नियम राज्य के अन्य सभी शिक्षण संस्थानों (कॉलेजों व यूनिवर्सिटी) पर भी समान रूप से लागू होता है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और रंजन शर्मा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान इस पहलू पर स्पष्टता आवश्यक मानी कि क्या सुरक्षा के लिहाज से 15 वर्ष पुराने वाहनों पर प्रतिबंध का दायरा केवल स्कूली बसों तक सीमित है अथवा इसे उच्च शिक्षण संस्थानों के परिवहन साधनों पर भी लागू किया जाना चाहिए।
अदालत ने महाधिवक्ता को इस विषय पर संबंधित विभाग से निर्देश प्राप्त कर स्थिति स्पष्ट करने के लिए समय दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी। हालांकि अभी तक हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को 15 साल पुरानी बसों के जरिए स्कूली छात्रों को परिवहन सुविधा प्रदान करने के लिए अंतरिम राहत दी है। अदालत ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वाहन की उम्र की शर्त को छोड़कर बाकी सभी औपचारिकताएं और शर्तें पूरी होनी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिए हैं कि स्कूली बसों के लिए 15 साल की समय-सीमा बच्चों की सुरक्षा का हवाला देकर तय की गई है। हालांकि ऐसे कई उदाहरण हैं जहां 20 से 25 साल पुरानी निजी और अन्य बसों को सड़कों पर चलने की अनुमति दी जा रही है।याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष सवाल उठाया कि आम यात्रियों और स्कूली छात्रों की सुरक्षा के मापदंड अलग-अलग नहीं हो सकते। यदि 20 साल पुरानी बस में आम यात्री सुरक्षित हैं, तो यह मानना तर्कसंगत नहीं है कि 15 साल पुरानी बस में छात्र असुरक्षित होंगे।