हिंदी भाषा के जाने-माने विद्वान प्रोफेसर डॉ. रामनाथ मेहता
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हिंदी की प्रतिष्ठा तब तक नहीं हो सकती है, जब तक साहित्यिक हिंदी के पीछे ले-देकर पड़ने के बजाय इसे आम आदमी से जोड़ने के प्रयास नहीं किए जाएं। राजभाषा के सम्मान में कवि गोष्ठियां, निबंध, भाषण आदि स्पर्धाएं करवाने से आगे कदम बढ़ाने होंगे। इसे शिक्षा की सृजनात्मक धाराओं में जोड़ना होगा। आज का युग धर्म विज्ञान, सूचना और तकनीकी का है। इन सबसे इसे जोड़े जाने की जरूरत है। अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान में सोमवार को हिंदी भाषा के जाने-माने विद्वान प्रोफेसर डॉ. रामनाथ मेहता ने विशेष बातचीत में ये बातें कहीं।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय सांध्यकालीन अध्ययन केंद्र शिमला के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. रामनाथ मेहता ने कहा कि इस विषय पर एक बड़ी बहस की जरूरत है। आज स्थिति यह है कि हिंदी की एक अधिसूचना निकालने के लिए बहुत माथापच्ची करनी पड़ती है। कोविड के जमाने में ही देख लें कि कितनी अधिसूचनाएं हिंदी में निकालीं गईं और जो आई भी होंगी, वे कितनी समझ में आई होंगी। एक तरफ कहा जाता है कि अंग्रेजी का प्रयोग न करें, हिंदी का करें मगर फिर भी प्रतिष्ठा की भाषा अंग्रेजी बताई जाती है। हिंदी को व्यवसाय, विज्ञान, तकनीकी और कंप्यूटर में लाया जाए। भाषण देने में जो सम्मान नेताओं सेे हिंदी को मिल रहा है, वही सम्मान अगर और जगह भी मिले तो बात बनें।
हिंदी में बोलने से अगर वोट मिल सकते हैं तो यह सूचना, तकनीक और कंप्यूटर की सहजता से स्वीकार्य भाषा क्यों नहीं बन सकती। हिंदी में किसी को इंसेंटिंव देने की जरूरत नहीं। इसे पैसे, वृत्ति, मान-सम्मान आदि से सहज तरीके से जोड़ा जाना चाहिए। आज तो अनपढ़ व्यक्ति भी अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं। मोबाइल की भाषा भी 90 फीसदी लोगों की अंग्रेजी ही है। भारत का इतना बड़ा जनमानस है। यह हिंदी को क्यों नहीं अपना सकता। जहां इसे मान-सम्मान मिलना चाहिए, वहां नहीं मिल पाता है। इसमें सरकारों की ही नहीं, हम सबकी भी गलती है।