विंग के सीनियर टेक्निकल असिस्टेंट जावेद ने बताया कि पानी का स्तर गिर रहा है, जो भविष्य के लिए बड़े खतरे का संकेत है। उधर, सर्दियों में बर्फबारी कम हो रही है तो स्नो लाइन भी ऊंचे इलाकों की ओर खिसकती जा रही है। अक्सर बर्फ से लकदक रहने वाली सिरमौर के चूड़धार की चोटियों में इस बार नाममात्र बर्फ है।
जीबी पंत हिमालयन एवं पर्यावरणीय विकास संस्थान कुल्लू के पर्यावरणीय वैज्ञानिक डॉ. जेसी कुनियान के शोध के अनुसार वर्ष 1962 में पार्वती ग्लेशियर के मुहाने की ऊंचाई समुद्रतल से 3987 मीटर थी। वर्ष 2016 में यह 4226 मीटर पहुंच गई।
डॉ. कुनियान के अनुसार हर साल ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं, जिससे ग्राउंड वाटर लेवल और सरफेस वाटर में कमी आ गई है। मैदानी इलाकों में पानी की खपत बढ़ना भी इसकी वजह है। ऐसे पेड़ लगाने होंगे, जो पानी को रिस्टोर करते हैं।
सिरमौर के कालाअंब क्षेत्रों में जहां भूमिगत जल का स्तर गिरा है, वह औद्योगिक क्षेत्र है। इस इलाके में कई निजी बोरवेल भी लगे हुए हैं। भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन होना भी पानी का स्तर गिरने का एक कारण है। वर्तमान में खैरी योजना से लगभग 35 लाख लीटर पानी रोजाना दोहन किया जा रहा है।
ऐसे रिचार्ज किए जाएंगे भूमिगत जल स्रोत- वाटर लेवल गिरने से चिंतित हाइड्रोलॉजिस्ट विंग ने डायरेक्ट इंजेक्शन विधि से पेयजल स्रोतों को रिचार्ज करने का प्राक्कलन बनाया है। इसे आईपीएच विभाग को सौंपा गया है।
इसके तहत बारिश के पानी को रिस्टोर कर पाइपों के माध्यम से बोरवेल के समीप से डाला जाएगा। इससे भूमिगत जल का स्तर ऊपर आएगा। जावेद के मुताबिक यह विधि सरल और भूमिगत जल को जल्द रिचार्ज करने में मददगार है। उन्होंने इसके लिए कुल 14 साइट चिह्नित की हैं।