तीनों युवकों ने बताया कि उन्हें कहा गया था कि वह वहां की एक कंपनी में काम करेंगे, लेकिन जब वह पहुंचे तो उन्हें वहां बदू (लोकल ठेकेदार) के पास भेजा गया। उनके सारे दस्तावेज लेकर उन्हें आगे एक कंपनी के पास नौकर रखवा दिया।
सर्दियों में उन्हें हीटर तक नहीं दिए। वहां आठ घंटे काम करने के 1800 रियाल (करीब 35 हजार) मासिक वेतन और ओवरटाइम का अलग से भुगतान करने की बात कही थी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बंधकों की तरह उनसे 12 घंटे काम लिया जाता।
उन्होंने जब उनसे पशुओं जैसा व्यवहार करने का विरोध किया तो प्रताडि़त करते थे। इस बारे में उन्होंने एजेंट को भी उसके सऊदी अरब आने पर बताया था, जिसने काम करने के लिए तकलीफें सहने की नसीहत दी।
बीमारी की हालत में भी उन्हें कोई चिकित्सीय सुविधा नहीं दी गई। युवकों के लौटने की खबर मिलते ही परिजनों में खुशी की लहर दौड़ गई है। उन्होंने उनकी सकुशल वापसी के लिए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का आभार जताया है।
तीनों युवकों ने बताया कि उनके पासपोर्ट अभी भी कंपनी मालिक के पास हैं। उन्हें भारतीय दूतावास ने तत्काल पासपोर्ट बनाकर सऊदी से हैदराबाद भेजा। वहां से घर तक पहुंचने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं।
वह हैदराबाद में किसी से उधार लेकर रुपये का जुगाड़ कर रहे हैं। जेल में भी उनके साथ पशुओं जैसा व्यवहार किया गया। उन्हें एक कमरे में भेड़-बकरियों की तरह ठूंस कर रखा गया।