राठी ने कुल्लवी के अलावा मंडयाली, कांगड़ी, अप्पर शिमला के लोकगीत भी गाए हैं। उनका मुख्य मकसद लोक संस्कृति का संरक्षण है। हिमाचली फोक को बुलंदी पर देखना लक्ष्य है। उनका कहना है कि हर गीत में नयापन लाने के साथ संस्कृति की महक जिंदा रखने की कोशिश की जाती है।
उन्होंने कहा कि मेरे गीतों को चोरी करने के बाद उन्हें गाकर कई बड़े गायक बन गए हैं। पर उन्होंने कभी भी पुराने गीत तोड़-मरोड़ कर नहीं गाए और न ही दूसरों के गीत गाए। पिता स्वर्गीय ख्याल चंद राठी भी गाने का शौक रखते थे।
इन लोकगीतों ने फैंस पर छोड़ी छाप
ठाकुर दास राठी के शालू रे क्वाटरा, हो सुमित्रा, बांकी चंद्रा, हवा लागी चंडीगढ़ा री, प्रमिला तेरे गांवा लागे मेले, नीशू चाली कॉलेजा, नीलूए मेरी लशटिए, सुषमा मेरी जानिए, रूशदे मनांदे, नीली नील अखियां काजलू लाया, झूमके वाली मेरी झूमके वाली गीत उनके फैंस के दिलों में छाप छोड़ गए हैं। ठाकुर दास राठी के लोकगीतों का डीजे पर भी खूब धमाल मचता है।