सार
हिमाचल प्रदेश के नौ गांवों के 486 परिवारों पर किए गए अध्ययन में रोजगार और शिक्षा की कमी को पलायन के प्रमुख कारणों में शामिल पाया गया। अध्ययन में शामिल अधिकतर लोग नियमित रूप से गांव लौटते रहे। बाहर रहकर कमाई करने वाले कई लोगों ने परिवारों को पैसे भेजे, जिनका इस्तेमाल घरेलू खर्च, कृषि और शिक्षा पर हुआ।
क्यों गांव छोड़ रहे हिमाचली? अध्ययन में खुलासा
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
बेहतर रोजगार और शिक्षा की तलाश में हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी गांवों से लोग बाहर जरूर जा रहे हैं, लेकिन अपनी जड़ों से उनका जुड़ाव बरकरार है। राज्य के नौ जिलों के नौ गांवों में किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि सर्वेक्षण में शामिल लोगों का पलायन मुख्य रूप से अस्थायी प्रकृति का था। वे समय-समय पर अपने गांव लौटते रहे और परिवारों से जुड़े रहे। यह शोधपत्र हाल ही में फ्रंटियर्स इन ह्यूमन डायनेमिक्स शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन मंडी जिले के धनरासी, चंबा के भरमाला, सिरमौर के बटोल, सोलन के कियारटू, कांगड़ा के राख, कुल्लू के मेहा, शिमला के फिरनू, किन्नौर के सार्यो और लाहौल-स्पीति के करदांग गांवों में किया गया।
शोध में विभिन्न संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं ने नौ गांवों के 486 परिवारों के कुल 1,894 लोगों से जुटाई गई जानकारी का विश्लेषण किया। अध्ययन में दर्ज 440 लोगों के जवाबों के अनुसार, 40.68 प्रतिशत ने रोजगार के अवसरों की कमी और 38.64 प्रतिशत ने शिक्षा को पलायन का प्रमुख कारण बताया।
शोध में शिक्षा और पलायन के बीच भी उल्लेखनीय संबंध सामने आया। अध्ययन के अनुसार, उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में पलायन की संभावना कम पढ़े-लिखे लोगों की तुलना में 9.96 गुना दर्ज की गई। शोधकर्ताओं का मानना है कि बेहतर रोजगार और शिक्षा की तलाश लोगों को गांवों से बाहर जाने के लिए प्रेरित करती है। इससे संकेत मिलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उपलब्धता बेहतर करने से पलायन के स्वरूप पर असर पड़ सकता है।
तीन से छह महीने में गांव लौट रहे हिमाचली
अध्ययन में शामिल 440 लोगों में से 74.55 प्रतिशत हर तीन से छह महीने में अपने गांव लौटते थे, जबकि 95 प्रतिशत एक साल के भीतर गांव आए। सर्वेक्षण में शामिल नौ गांवों में स्थायी पलायन का मामला दर्ज नहीं हुआ। हालांकि, यह निष्कर्ष अध्ययन में शामिल गांवों तक ही सीमित है और इसे पूरे हिमाचल प्रदेश की स्थिति का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। अध्ययन के अनुसार, 68.42 प्रतिशत लोग हिमाचल प्रदेश के भीतर ही दूसरी जगहों पर गए, जबकि 26.81 प्रतिशत राज्य से बाहर और 4.77 प्रतिशत विदेश गए। इनमें से 69.30 प्रतिशत पर्वतीय क्षेत्रों और 30.70 प्रतिशत मैदानी या तराई क्षेत्रों की ओर गए।
परिवारों को पैसे भेजकर निभा रहे जिम्मेदारी
पलायन के आर्थिक प्रभाव का आकलन करते हुए शोध में पाया गया कि 36.59 प्रतिशत लोग अपने परिवारों को पैसे भेजते थे। अध्ययन में एक गांव में औसतन हर महीने 1.41 लाख रुपये पहुंचने का अनुमान लगाया गया। बाहर रहने वाले लोगों की ओर से भेजी गई औसत राशि 7,880 रुपये प्रतिमाह दर्ज की गई।
शोध के मुताबिक, भेजी गई रकम में से 36.65 प्रतिशत घरेलू खर्च, 24.22 प्रतिशत कृषि और 22.98 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च हो रही थी। इसके अलावा 10.57 प्रतिशत राशि बचत और मकान संबंधी जरूरतों, 4.34 प्रतिशत स्वास्थ्य और 1.24 प्रतिशत कर्ज चुकाने पर खर्च की गई।
'हिमाचल में पलायन अस्थायी, लोग जड़ों से जुड़े'
समाजशास्त्री डॉ. मोहन झारटा के अनुसार, आम कहावत है कि पहाड़ की जवानी और पानी बाहर के लोगों के काम आते हैं, लेकिन हिमाचल प्रदेश की स्थिति उत्तराखंड से अलग है। उन्होंने कहा कि अध्ययन भी इसी ओर ध्यान खींचता है। उनके अनुसार, राज्य में स्वरोजगार के कई साधन उपलब्ध हैं। निचले क्षेत्रों में कृषि और ऊपरी इलाकों में बागवानी आजीविका के वैकल्पिक साधन हैं। इसलिए उनके विचार में हिमाचल में पलायन अस्थायी प्रकृति का है और लोग बाहर रहने के बावजूद अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं।