ब्रैकेल मामले में जहां कैबिनेट की मंजूरी के बाद पेंच इस बात पर फंस गया था कि केंद्रीय नेतृत्व के करीबी कहे जाने वाले अडानी के खिलाफ भी मामला दर्ज होगा या नहीं। वहीं, एचपीबीएल को लेकर भी वर्मा और सरकार के बीच मतभेद था क्योंकि सरकार जहां एक ओर कांग्रेस चार्जशीट के एलान के बाद भाजपा चार्जशीट के मामलों में एक्शन को लेकर दबाव बना रही थी।
वहीं, विजिलेंस ब्यूरो एचपीबीएल मामले में एफआईआर होने को लेकर ही स्पष्ट नहीं था। धूमल के करीबी माने जाने वाले पूर्व डीजीपी डीएस मन्हास और रिटायर्ड एसपी हरदेश बिष्ट के मामले वापस लेने को लेकर भी सरकार और वर्मा के बीच खींचतान चल रही थी।
सूत्रों का कहना है कि वर्मा ने बिंदल मामले में भी केस वापस लेने को लेकर आपत्ति जताई थी। जिसके बाद से ही उनकी ब्यूरो से छुट्टी होना तय माना जा रहा था। अब देखना यह है कि सरकार और ब्यूरो के बीच की खींचतान को खत्म कर नए ब्यूरो प्रमुख कैसे इन पेचीदा मामलों को हैंडल करते हैं।