राजकीय अध्यापक संघ के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र चौहान का कहना है कि किसी एक संगठन को इस तरह तरजीह देना तर्क संगत नहीं है। प्रदेश में यह गलत परंपरा शुरू की जा रही है। इस परिपाटी से सरकार अपनी राह में कांटे बिछा रही है।
प्रदेश में शिक्षकों के 36 अन्य संगठन भी हैं। इन सभी संगठनों के लिए इस प्रकार की व्यवस्था करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। एक विशेष संगठन के लिए बरती जा रही नरमी सीधे तौर पर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग है। उन्होंने कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए काम जरूरी है।
हम स्वयं इस तरह के आयोजन कर चुके हैं लेकिन सरकारी मशीनरी के दम पर ऐसा करना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि एक संगठन के एजेंट के तौर पर सरकार का काम करना गलत है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के समक्ष भी इस मामले को उठाया जाएगा।
हिमाचल शिक्षक महासंघ के अध्यक्ष रजनीश चौधरी का कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे नए प्रयोग का विरोध करने वाले संगठनों ने शिक्षा के हित में खुद कुछ काम नहीं किया है।
लालपानी में आयोजित होने वाले दो दिवसीय सेमिनार के माध्यम से सरकार को सुझाव दिए जाएंगे। हमने सभी शिक्षकों को आमंत्रित किया है। अन्य संगठन पदाधिकारियों को विरोध करने की जगह सेमिनार में भाग लेकर सुझाव देने चाहिए।
शिक्षा महासंघ ने शिक्षा विभाग से जुड़े कई वर्तमान और पूर्व अफसरों सहित केंद्रीय विश्वविद्यालय से भी विशेषज्ञ बुलाए हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा में सुधार करने के लिए पुरानी परंपराओं को तो तोड़ना ही पड़ेगा। शिक्षा में गुणवत्ता लाने के उद्देश्य से ही निदेशालय ने जिलों को यह पत्र जारी किया है। शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज को भी संघ ने सेमिनार में बुलाया है।