हिमाचल प्रदेश में पहाड़ों के धंसने के लिए केवल भारी बारिश ही जिम्मेदार नहीं है। कमजोर भूगर्भीय संरचना, अवैज्ञानिक कटान व अनियोजित निर्माण से प्रदेश के पहाड़ दरक रहे हैं। 2025 में मई से सितंबर तक भूस्खलन की 4,644 घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें से सबसे ज्यादा कुल्लू जिला में हुई हैं। अध्ययन में यह बातें सामने आई हैं। यह अध्ययन निदेशक आपदा प्रबंधन एवं विशेष सचिव डॉ. पुष्पेंद्र राणा, आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ डॉ. रितेश कपूर और राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र की साइंटिफिक प्रोफेशनल नेहा ठाकुर ने संयुक्त रूप से किया है।
इस अध्ययन में मई से सितंबर 2025 के बीच सेंटिनल-2 उपग्रह डाटा से प्रदेश में 4,644 भूस्खलन मानचित्र तैयार किए गए। इन कमजोर और नाजुक भूगर्भीय बनावट, खड़ी ढलान, नदी कटाव के साथ सड़क निर्माण के लिए पहाड़ों की अवैज्ञानिक कटाई, अनियोजित निर्माण और प्राकृतिक जल निकासी में बदलाव भी ढलानों को अस्थिर कर रहे हैं। सड़कों के निर्माण और चौड़ीकरण के दौरान अवैज्ञानिक तरीके से पहाड़ काटने से ढलानों की प्राकृतिक स्थिरता प्रभावित होती है। ढलानों और नदी घाटियों में बस्तियों, होटलों और अन्य बुनियादी ढांचे के अनियोजित विस्तार से प्राकृतिक जल निकासी प्रभावित हो रही है। जंगलों की कटाई और प्राकृतिक नालों के प्रवाह में बाधा भी बारिश के पानी के बहाव को बदलकर ढलानों को नाजुक बना रही है।
रिपोर्ट के अनुसार 2025 में कुल्लू सबसे अधिक प्रभावित रहा है। यहां 1,335 भूस्खलन से 1,310.98 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ। मंडी में 798 घटनाओं से 623.34 हेक्टेयर, कांगड़ा में 526 घटनाओं से 307.95 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ।