हिमालयी राज्यों ने अपने पहले कॉन्क्लेव में राज्यों के विकास और समस्याओं का त्वरित समाधान के लिए अलग मंत्रालय बनाने और पर्यावरण संरक्षण में योगदान के लिए ग्रीन बोनस देने की मांग की। पहाड़ों की रानी मसूरी में रविवार को करीब छह घंटे के मंथन के बाद पर्वतीय राज्यों में सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास, मजबूत आपदा प्रबंधन तंत्र सहित आठ मुद्दों पर सहमति बनीं।
कार्यक्रम के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बताया कि ग्रीन बोनस, आपदा प्रबंधन तंत्र की मजबूती, जल शक्ति, पर्यावरणीय सेवाओं पर कॉमन एजेंडा तैयार किया गया है। यह एजेंडा केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को सौंपा गया। ग्रीन बोनस पर रावत ने कहा कि देश की अधिकांश नदियों का उद्गम हिमालय से होता है, लिहाजा हिमालयी राज्यों को प्रधानमंत्री के जल संरक्षण अभियान में अहम भूमिका निभानी है।
यह इसलिए भी जरूरी है कि हिमालयी राज्यों का पर्यावरण संरक्षण में सबसे बड़ा योगदान है। साथ ही हिमालयी राज्य नुकसान में भी हैं क्योंकि अधिकांश भूमि का हिस्सा पर्यावरण-संवेदनशील जोन में चला जाता है, जिससे वहां विकास की गतिविधियां नहीं हो सकतीं। इसी नुकसान की भरपाई के लिए हिमालयी राज्यों को ग्रीन बोनस मिलना चाहिए।
वहीं, वित्त मंत्री ने कहा कि सीमांत क्षेत्र से पलायन को रोकने के लिए इस क्षेत्र के विकास को विशेष तवज्जो दी जानी चाहिए। उन्होंने पर्यावरणीय सुरक्षा, पर्वतीय क्षेत्रों में जैविक खेती, स्थानीय युवाओं के लिए स्टार्ट अप आदि पर जोर दिया। कार्यक्रम में असम को छोड़कर दस पर्वतीय राज्यों ने शिरकत की।
‘ पर्वतीय राज्यों की समस्याएं अन्य राज्यों से अलग हैं। इन राज्यों में हवाई और रेल संपर्क बढ़ाना प्राथमिकता होनी चाहिए। हमारे सीमित संसाधनों को ध्यान में रखते हुए वित्तीय सहायता में हमें अन्य राज्यों की तुलना में वरीयता मिलनी चाहिए।’
- जयराम ठाकुर, मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश
इन मुद्दों पर भी बनी सहमति
- हिमालयी राज्य केंद्र के जल शक्ति संचय मिशन में प्रभावी योगदान देंगे
- नदियों के संरक्षण-पुनर्जीवन को केंद्रीय योजनाओं में ज्यादा बजट मिले
- नए पर्यटक स्थल विकसित करने को केंद्र से आर्थिक सहायता मिले
- हिमालयी राज्यों का कॉन्क्लेव अब हर साल आयोजित किया जाएगा