सरकार ने लॉटरी से शुरुआती तौर पर सालाना करीब 50 करोड़ रुपये अतिरिक्त राजस्व जुटाने का लक्ष्य रखा है। अधिकतम आय का अनुमान करीब 100 करोड़ रुपये तक लगाया गया है। ऐसे में टेंडर प्रक्रिया में कंपनियों की कम रुचि सरकार के राजस्व लक्ष्य के लिए पहली बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। सरकार ने बीते माह नियम अधिसूचित करने और राज्यपाल की मंजूरी के बाद वित्त विभाग के अधीन लॉटरी निदेशालय के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर ई-टेंडर जारी किया था।
उम्मीद थी कि बड़ी और अनुभवी लॉटरी कंपनियां इसमें भाग लेंगी, लेकिन शुरुआती स्तर पर अपेक्षित प्रतिस्पर्धा नहीं बन पाई। कंपनियों की बेरुखी के पीछे टेंडर की कड़ी वित्तीय शर्तों, लाइसेंस फीस, बैंक गारंटी और राजस्व शेयरिंग मॉडल को वजह माना जा रहा है। सरकार ने लॉटरी व्यवस्था को पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए बोलीदाताओं पर कड़े वित्तीय मानदंड लगाए हैं। विभागीय अधिकारियों के अनुसार यदि 28 सितंबर तक भी पर्याप्त कंपनियां सामने नहीं आती हैं तो सरकार के सामने टेंडर की शर्तों और राजस्व मॉडल में बदलाव करने का विकल्प रहेगा।
टिकटों पर हिमाचल सरकार का लोगो, डिजिटल हस्ताक्षर, ड्रॉ की तारीख और समय तथा एमआरपी दर्ज होगी। पंजाब में लॉटरी से सालाना करीब 225 करोड़ रुपये राजस्व मिलने का दावा किया जाता है। सरकार का तर्क है कि मिलने वाली राशि को जनकल्याणकारी योजनाओं में लगाया जा सकता है।
कंपनियों के सामने बड़ी वित्तीय शर्तें
कंपनियों की 50 करोड़ रुपये न्यूनतम नेटवर्थ जरूरी होनी चाहिए। 30 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी/एफडी सिक्योरिटी, 10 करोड़ रुपये सालाना लाइसेंस फीस, लाइसेंस फीस में हर साल 5 फीसदी बढ़ोतरी, कम से कम 6 करोड़ रुपये की गारंटीड राजस्व हिस्सेदारी, बोली के साथ 2 करोड़ रुपये बयाना राशि, टेंडर शुल्क के रूप में 5 लाख रुपये की शर्त रखी गई है। इसके अलावा किसी राज्य में कम से कम दो साल का लॉटरी संचालन अनुभव अनिवार्य किया गया है। भुगतान में देरी पर 12 फीसदी दंडात्मक ब्याज देना होगा। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत हिमाचल में ऑनलाइन के साथ पारंपरिक पेपर टिकट वाली लॉटरी भी संचालित होगी। एक दिन में अधिकतम 12 ड्रॉ आयोजित किए जा सकेंगे। सालभर में केवल तीन बंपर ड्रॉ होंगे।