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हिमाचल हाईकोर्ट की टिप्पणी: 'सिर्फ स्टाफ की कमी पर इच्छा के विरुद्ध सेवा को मजबूर नहीं कर सकते

Sun, 29 Jun 2025 05:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला

सार

 प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि कॅरिअर में प्रगति हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। कर्मचारी को सिर्फ स्टाफ की कमी के आधार पर अपनी इच्छा के विरुद्ध सेवा में बने रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। 
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि कॅरिअर में प्रगति हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। कर्मचारी को सिर्फ स्टाफ की कमी के आधार पर अपनी इच्छा के विरुद्ध सेवा में बने रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की एकल पीठ ने कहा कि इस्तीफे या अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) के अनुरोध को मनमाने ढंग से अस्वीकार नहीं किया जा सकता। खासकर जब आवेदक पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद पांच साल तक सुपर स्पेशलिस्ट के रूप में राज्य की सेवा करने को तैयार हो।

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न्यायालय ने माना कि संस्थागत आवश्यकता के आधार पर अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करने या इस्तीफे को स्वीकार करने से इन्कार करना अनुचित था। इसलिए न्यायालय ने प्रतिवादियों को एनओसी जारी करने और बिना वेतन के असाधारण अवकाश देने के निर्देश दिए हैं। याचिकाकर्ता को पांच साल तक सुपर स्पेशलिस्ट के रूप में राज्य की सेवा करने के लिए लिखित वचन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। यह मामला चंबा के मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत एक चिकित्सक से जुड़ा है।

उन्होंने एनईईटी सुपर स्पेशलिटी प्रवेश परीक्षा में मेरिट हासिल के आधार पर 3 साल के डीएनबी-एसएस कार्डियोलॉजी कोर्स के लिए अखिल भारतीय कोटा सीट आवंटित की गई। 12 जून को याचिकाकर्ता ने कोर्स करने के लिए एनओसी के लिए आवेदन किया, लेकिन अधिकारियों ने कोई निर्णय नहीं लिया। चूंकि प्रवेश की अंतिम तिथि 19 जून थी, इसलिए याचिकाकर्ता ने 14 जून को इस्तीफा दे दिया। एनओसी देने या इस्तीफा स्वीकार करने में अधिकारियों की देरी और निष्क्रियता के कारण याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट में याचिका दायर करनी पड़ी। उन्होंने तर्क दिया कि स्टाफ की कमी के आधार पर अनापत्ति प्रमाणपत्र से इन्कार या इस्तीफे को अस्वीकार करना मनमाना था।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि यदि उन्हें बिना वेतन के अवकाश की अनुमति दी जाती है, तो वह कोर्स पूरा करने के बाद पांच साल तक सुपर स्पेशलिस्ट के रूप में राज्य की सेवा करने का लिखित वचन देने को तैयार हैं। वहीं, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि मेडिकल कॉलेज और आम जनता के हित में एनओसी और इस्तीफे के अनुरोध को खारिज कर दिया गया था। यदि याचिकाकर्ता को इस स्तर पर राहत दी जाती है, तो फैकल्टी की कमी के कारण चिकित्सा संस्थान के कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और नेशनल मेडिकल कमीशन की ओर से निर्धारित न्यूनतम फैकल्टी आवश्यकताओं को पूरा न करने से दंड और मान्यता रद्द होने का खतरा हो सकता है। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार करते हुए यह फैसला पारित किया है।

समय से जवाब दायर नहीं करने पर कोर्ट का संयुक्त आयुक्त आबकारी को नोटिस
 प्रदेश हाईकोर्ट में समय से जवाब दायर नहीं करने पर संयुक्त आयुक्त आबकारी को कारण बताओ नोटिस जारी हुआ है। कर एवं आबकारी आयुक्त ने हाईकाेर्ट से लगी कड़ी फटकार के बाद संयुक्त आयुक्त जीडी ठाकुर से जवाबतलबी की है। आरोप है कि कई सुनवाई के बाद भी संयुक्त आयुक्त की ओर से हाईकोर्ट को जानकारी नहीं दी गई। अधिकारी का जवाब संतोषजनक नहीं पाए जाने पर इनके खिलाफ कोर्ट के आदेश की अवहेलना के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। हाईकोर्ट के समक्ष दो याचिकाओं में न्यायालय के निर्देशों का पालन न करने के लिए संयुक्त आयुक्त को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। राज्य कर एवं आबकारी विभाग के संयुक्त आयुक्त पर कर्तव्य में लापरवाही बरतने का आरोप है।
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आबकारी आयुक्त की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस में लिखा गया है कि दो अलग-अलग मामलों में संयुक्त आयुक्त प्रतिवादी थे। सीडब्ल्यूपी संख्या 6717/2025 (शीर्षक मेसर्स एचएम स्टील लिमिटेड बनाम संयुक्त आयुक्त राज्य कर एवं आबकारी) तथा सीडब्ल्यूपी संख्या 6739/2025, जिसका शीर्षक मेसर्स एचएम स्टील लिमिटेड बनाम भारत संघ एवं अन्य है। हाईकोर्ट की ओर से बार-बार अवसर दिए जाने तथा स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अधिकारी दोनों मामलों में समय पर जवाब दाखिल करने में विफल रहे। खास तौर पर सीडब्ल्यूपी संख्या 6739/2025 में गैर-अनुपालन के कारण हाईकोर्ट की ओर से प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज की गईं। यह भी पाया गया कि अधिकारी को महाधिवक्ता के कार्यालय से याचिका प्राप्त हुई, लेकिन न तो उस पर कार्रवाई की गई और न ही संबंधित विभाग को सूचित किया गया। शनिवार को जारी कारण बताओ नोटिस में संयुक्त आयुक्त पर आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही और कदाचार का आरोप लगाया गया है। अधिकारी को नोटिस प्राप्त होने के दो दिनों के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया गया है। ऐसा न करने पर सेवा नियमों के अनुसार अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की जाएगी।
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