अदालत में दायर हलफनामे से यह स्पष्ट हुआ है कि छह पूर्व सीपीएस अभी भी सरकारी आवासों का उपयोग कर रहे हैं और ये न तो आवासों का लाइसेंस शुल्क भर रहे हैं और न ही विधानसभा सचिवालय उनके वेतन से इसकी कटौती कर रहा है। खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पूर्व सीपीएस अपनी वर्तमान पात्रता से कहीं अधिक बड़े और बेहतर सरकारी आवासों का लाभ उठा रहे हैं, जो कि कानूनन गलत है।
राज्य सरकार ने दलील दी थी कि इन नेताओं को सुप्रीम कोर्ट में लंबित स्पेशल लीव पिटीशन के अंतिम फैसले तक रहने की अनुमति दी गई है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल उनकी अयोग्यता और फैसले के एक विशिष्ट पैराग्राफ (पैरा-53) पर रोक लगाई है। कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि सरकार ने इन आवासों के आवंटन को रद्द करने के लिए अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। अदालत के सख्त रुख को देखते हुए राज्य सरकार ने 6 जून 2025 के निर्णय को रिकॉर्ड पर रखने के लिए समय मांगा है, जिसके तहत इन नेताओं को आवास में रहने की अनुमति दी गई थी। अदालत अब इस मामले की अगली सुनवाई 25 जून को करेगी।
न्यायाधीशों को आवास न देने पर सख्त रुख बरकरार
कोर्ट ने न्यायाधीशों को सरकारी आवासों की सुविधा मुहैया न करवाने पर अपना सख्त रुख भी बरकरार रखा है। कोर्ट के संज्ञान में लाया गया कि नियुक्तियां रद्द होने के बाद सीपीएस सरकारी आवासों पर रह रहे हैं। उनके आवास हाईकोर्ट के समीप स्थित हैं। कोर्ट ने कहा कि इनका उपयोग उन न्यायाधीशों को आवंटित करने के लिए किया जा सकता है, जिन्हें लंबी दूरी से आना-जाना पड़ता है।
नवंबर 2024 में दिए थे सीपीएस को हटाने के आदेश
हाईकोर्ट ने 13 नवंबर 2024 को कांग्रेस सरकार में बनाए छह सीपीएस को हटाने के आदेश दिए थे। कोर्ट ने इनकी नियुक्तियों को असांविधानिक करार दिया था। साथ ही 2006 के सीपीएस एक्ट को निरस्त कर दिया है। अदालत ने सरकारी सुविधाएं जैसे सरकारी गाड़ी, बंगला, सैलरी, स्टाफ तुरंत प्रभाव से वापस लेने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट के फैसले को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।