अदालत ने नाराजगी जताई
अदालत ने नाराजगी व्यक्त की कि एनएचएआई के हलफनामे में नवंबर 2026 तक स्टोन क्रशर को हटाने के पुराने वादे पर कोई स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया है। इसके अलावा डिवेंचर होटल के पास जहां फोरलेन नहीं बना है, वहां के काम की समयसीमा भी स्पष्ट नहीं है। हाईकोर्ट ने इन सभी बिंदुओं पर एनएचएआई और सरकार से ताजा प्रगति रिपोर्ट तलब की है। मामले की अगली सुनवाई 9 दिसंबर को होगी। सुनवाई के दौरान एनएचएआई के परियोजना निदेशक आनंद कुमार द्वारा दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में विभिन्न कार्यों की प्रगति साझा की गई। चक्की मोड़ पर 260 मीटर लंबे वायाडक्ट (पुल) के निर्माण के लिए अनुबंध समझौते पर हस्ताक्षर होना बाकी है, लेकिन एक महीने के भीतर काम शुरू होने की उम्मीद है।
ब्रेस्ट वॉल और घाटी की तरफ क्रैश बैरियर लगाए
पहाड़ी की तरफ ब्रेस्ट वॉल और घाटी की तरफ क्रैश बैरियर लगा दिए गए हैं। कुल 44 में से 38 स्थानों पर काम पूरा हो चुका है। शेष 6 जगहों पर स्थानीय निवासियों की ओर से डाली गई बाधाओं के कारण इस काम को हटा दिया गया है। समर हॉल के पास बेरखास गांव में रिटेनिंग वॉल का पुनर्निर्माण कर दिया गया है। यहां स्थायी बहाली के लिए वायाडक्ट निर्माण के टेंडर आमंत्रित किए गए हैं, इसमें तकनीकी मूल्यांकन पूरा हो चुका है और वित्तीय मूल्यांकन जारी है। अपोलो टायर शोरूम के पास बन रहे मुख्य पुल का 54 फीसदी काम पूरा हो चुका है, जिसे अप्रैल 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य है। वहीं, कंडाघाट में ठेकेदार के साथ चल रहे विवाद के सुलझने और 22 सितंबर 2026 को समझौता होने के बाद आरओबी-कम-वायाडक्ट का काम फिर शुरू हो गया है, जो सितंबर 2027 तक पूरा होगा।
अपील में 18 महीने की देरी माफ करने से हाईकोर्ट ने किया इन्कार
प्रदेश हाईकोर्ट ने इफको टोकियो जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के उस आवेदन को खारिज कर दिया, जिसमें रजिस्ट्री की आपत्तियों को दूर कर अपील दोबारा दाखिल करने में हुई एक वर्ष, 6 महीने और 11 दिन की देरी को माफ करने की गुहार लगाई गई थी। न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की अदालत ने स्पष्ट किया कि अदालतें प्रक्रियात्मक नियमों की अनदेखी करने वाली लापरवाही को यांत्रिक रूप से माफ नहीं कर सकती हैं। बीमा कंपनी की ओर से अदालत में दलील दी गई थी कि रजिस्ट्री की ओर से उठाई गई आपत्तियों को उनके वकील के क्लर्क ने 14 अगस्त 2024 को दूर कर दिया था, लेकिन इसके बाद वह क्लर्क नौकरी छोड़ कर चला गया। वकील इस गलतफहमी में रहे कि मामला अपने समय पर अदालत में सूचीबद्ध हो जाएगा। करीब एक साल बाद जुलाई 2025 में जब नए क्लर्क ने स्टेटस चेक किया, तब पता चला कि फाइल अभी भी आपत्तियों में ही फंसी हुई है। कंपनी ने दावा किया कि यह देरी जानबूझकर नहीं हुई थी। न्यायालय ने बीमा कंपनी के इन तर्कों को अपर्याप्त और लापरवाही भरा माना। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि नियमों के मुताबिक आपत्तियां दूर करने के लिए अधिकतम 20 दिनों का समय मिलता है। कोर्ट ने कहा कि यदि पुन: दाखिल करने में होने वाली हर लंबी और बिना वजह की देरी को अदालतें ऐसे ही माफ करने लगीं, तो नियमों का कोई महत्व नहीं रह जाएगा।