अदालत ने कहा कि जब किसी विशेष कार्य (जैसे रखरखाव या संचालन) का ठेका एक निश्चित अवधि के लिए दिया जाता है, तो उस ठेकेदार द्वारा रखे गए कर्मचारी यह दावा नहीं कर सकते कि ठेका समाप्त होने के बाद नए ठेकेदार या सरकार को उन्हें नौकरी पर बनाए रखना ही होगा।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आउटसोर्स कर्मचारियों से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि किसी ठेकेदार (आउटसोर्सिंग एजेंसी) के माध्यम से तैनात कर्मचारियों का मुख्य नियोक्ता (सरकार या विभाग) के पास सेवा जारी रखने या नए ठेकेदार के अधीन स्थानांतरित किए जाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं बनता है। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने निर्मल सिंह व अन्य द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया।
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अदालत ने कहा कि जब किसी विशेष कार्य (जैसे रखरखाव या संचालन) का ठेका एक निश्चित अवधि के लिए दिया जाता है, तो उस ठेकेदार द्वारा रखे गए कर्मचारी यह दावा नहीं कर सकते कि ठेका समाप्त होने के बाद नए ठेकेदार या सरकार को उन्हें नौकरी पर बनाए रखना ही होगा। अदालत ने माना कि आउटसोर्स कर्मचारियों का मूल विभाग के साथ सीधा नियोक्ता-कर्मचारी संबंध नहीं होता। इसलिए उन्हें सेवा में बनाए रखने या नए ठेकेदार के पास समायोजित करने का कोई परमादेश जारी नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने याचिका को निरस्त कर दिया।
उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता 4 पंप ऑपरेटर और 1 हेल्पर उप-मंडल कलोल (जिला बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश) के अंतर्गत आने वाली मलारी बाहल सीना लिफ्ट पेयजल योजना में कार्यरत थे। उनका तर्क था कि वे सितंबर 2013 से काम कर रहे थे और उन्हें औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत बिना कोई नोटिस दिए मौखिक रूप से 3 फरवरी 2020 को हटा दिया गया। उन्होंने अपनी सेवाएं जारी रखने और आउटसोर्स कर्मचारियों के नियमितीकरण के लिए नीति बनाने की मांग की थी। राज्य सरकार और जल शक्ति विभाग की ओर से स्पष्ट किया गया कि याचिकाकर्ताओं को विभाग ने सीधे तौर पर नियुक्त नहीं किया था। वे ठेकेदार के कर्मचारी थे, जिसे 25 मार्च 2017 से 36 महीनों के लिए रखरखाव का ठेका मिला था।