हिमाचल प्रदेश में अस्पतालों की व्यवस्था संभालने के लिए सरकार की ओर से आउटसोर्स पर रोगी मित्र तैनात करने की योजना को हाईकोर्ट ने फिलहाल रोक दिया है। हाईकोर्ट ने 1,000 रोगी मित्रों की प्रस्तावित भर्ती पर रोक लगाते हुए सरकार की उस नीति पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसके तहत नियमित भर्ती करने के बजाय बार-बार आउटसोर्स कर्मचारियों के सहारे स्वास्थ्य संस्थानों में खाली पदों को भरने का प्रयास किया जा रहा है।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने बाल कृष्ण की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। याचिका में सरकार की उस योजना को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत स्टाफ नर्स के बराबर शैक्षणिक योग्यता रखने वाले 1,000 युवाओं को अस्पतालों में रोगी मित्र के तौर पर आउटसोर्स एजेंसियों के माध्यम से तैनात किया जाना था। इन कर्मचारियों को प्रति माह 15,000 रुपये का निश्चित मानदेय दिया जाना प्रस्तावित था।
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से उप अधिवक्ता जनरल ने अदालत को बताया कि सरकार इस नीति पर पुनर्विचार कर रही है। सरकार ने यह भी आश्वासन दिया कि एक अन्य संबंधित मामला लंबित रहने तक रोगी मित्र नीति को लागू नहीं किया जाएगा। अदालत ने सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए स्पष्ट कर दिया कि अगले आदेश तक रोगी मित्रों की नई भर्ती या तैनाती नहीं की जाएगी।
कोर्ट ने स्वास्थ्य संस्थानों में 290 पदों को भरने के लिए 1 अगस्त को जारी किए गए मांग पत्र पर भी कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने सवाल उठाया कि जब स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सा शिक्षा विभाग में स्टाफ नर्सों के 1,535 पद खाली पड़े हैं, तो नियमित भर्ती की दिशा में ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं।