उसके लिए पावर कॉरपोरेशन बाध्य नहीं था। कॉरपोरेशन की इस दलील को न्यायालय की ओर से नहीं माना गया और आदेश जारी किए कि वे प्रार्थी को भी अन्य लोगों की तरह बढ़ी हुई राशि का हस्तांतरण करे। न्यायालय ने यह भी पाया कि प्रार्थी को और लोगों के समान मुआवजा राशि प्राप्त करने के लिए बेवजह कोर्ट के चक्कर काटने पड़े जबकि पावर कॉरपोरेशन खुद ही लिखित करार के मुताबिक प्रार्थी को बढ़ी हुई मुआवजे की राशि देने के लिए सक्षम थी।
न्यायालय ने कहा कि पावर कॉरपोरेशन के कुछ अधिकारियों के लापरवाह रवैये के चलते बेवजह प्रार्थी को कोर्ट के समक्ष याचिका दाखिल करनी पड़ी। इससे न केवल प्रार्थी के समय की बरबादी हुई बल्कि पावर कॉरपोरेशन की ओर से बेवजह कोर्ट के कीमती समय को बरबाद किया गया।
न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि कॉस्ट की राशि पहले कॉरपोरेशन की ओर से जमा करवाई जाएगी। बाद में यह राशि उन लोगों से वसूली जाएगी जो लोग प्रार्थी को कोर्ट में बेवजह धकेलने के लिए जिम्मेदार थे, चाहे वे अभी नौकरी कर रहे हैं या नौकरी से सेवानिवृत्त हो गए हैं।