खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पंचायती राज अधिनियम, 1994 के तहत दो चरण अनिवार्य हैं। पहला धारा 3 के तहत सरकार की ओर से पंचायतों का निर्माण या विभाजन है और दूसरा कदम धारा 124 के तहत उपायुक्त (डीसी) की ओर से क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन करना है। इन दोनों चरणों में नियमों का पालन अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि परिसीमन के लिए हिमाचल प्रदेश पंचायती राज (चुनाव) नियम, 1994 के नियम 5, 6, 10 और 11 का पालन करना जरूरी है। इसमें प्रस्ताव पर 7 दिन का नोटिस, आपत्तियों के निपटारे के लिए 7 दिन और अपील के लिए 10 दिन का समय निर्धारित है।
जहां समय सीमाओं का पालन नहीं हुआ, वहां परिसीमन को स्पष्ट रूप से अवैध करार दिया गया है। खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि लंबित कार्यवाही केवल उन्हीं मामलों को माना जाएगा, जिनमें 13 फरवरी से पहले प्रस्ताव अधिसूचित किया जा चुका था। 6 महीने से धूल फांक रही फाइलों पर अचानक लिए गए फैसलों को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा। उधर, सरकार की ओर से अधिवक्ता अनूप रत्न ने बताया कि अदालत का आदेश केवल उन्हीं पर लागू होगा, जिन्होंने हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाएं दायर की हैं।