दुष्कर्म के मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म के मामलों में दोषसिद्धि पूरी तरह से सबूतों के आधार पर हो सकती है। बशर्ते, ऐसे सबूत कोर्ट को विश्वास करने के लिए प्रेरित करें। दुष्कर्म पीड़ित के साथ सहयोगी के रूप में व्यवहार नहीं किया जाता है। उसे केवल घायल गवाह के रूप में चित्रित किया जा सकता है। यह मान लेना भी उचित नहीं है कि महिला अपने सम्मान और प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर किसी व्यक्ति को झूठा फंसाएगी। हालांकि, अभियोजन पक्ष के दृढ़ और आश्वस्त साक्ष्य ही पीड़ित के साक्ष्य का समर्थन कर सकते हैं।
न्यायाधीश सबीना और न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने यह व्यवस्था दी है। ठोस सबूतों की गैर मौजूदगी में खंडपीठ ने आनंद गोपाल को दुष्कर्म के आरोपों से दोषमुक्त किया है। विशेष न्यायाधीश सोलन ने उसे 10 वर्षों की कठोर कारावास और पचास हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। अभियोजन पक्ष ने अभियुक्त के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। अभियुक्त सत्संग किया करता था। उसने पीड़ित के घर भी दो बार सत्संग किया था। पीड़ित ने पुलिस को शिकायत की थी कि एक दिन अकेली पाकर अभियुक्त ने उसके साथ दुष्कर्म किया है।
प्रारंभिक जांच के बाद अभियोजन पक्ष ने सत्र न्यायाधीश हमीरपुर की अदालत के समक्ष चालान पेश किया। अभियोग साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने 16 गवाहों के बयान दर्ज करवाए। निचली अदालत ने उसे 10 वर्षों की कठोर कारावास और पचास रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस निर्णय को हाईकोर्ट के समक्ष अपील के माध्यम से चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े तमाम रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि अभियोजन अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ अभियोग साबित करने में नाकाम रहा है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन की कहानी विरोधाभासी है। अभियोग में यदि शक की गुंजाइश रहती है तो इसका लाभ अभियुक्त को दिया जाना चाहिए।