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CPS Appointment Case: हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सीपीएस नियुक्ति एक्ट को किया निरस्त, सभी सुविधाएं खत्म

Thu, 14 Nov 2024 09:58 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो/संवाद, शिमला

सार

प्रदेश हाईकोर्ट ने सीपीएस एक्ट को निरस्त कर दिया है। इसके तहत सीपीएस को दी जा रही सभी सुविधाओं को खत्म कर दिया गया है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए छह मुख्य संसदीय सचिवों (सीपीएस) की नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी हैं। सीपीएस को सचिवालय का दफ्तर, गाड़ी, बंगला और अन्य सुविधाएं भी तुरंत छोड़ने के आदेश हुए हैं। हाईकोर्ट ने भाजपा नेताओं की याचिका पर यह बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश संसदीय एक्ट 2006 को भी निरस्त कर दिया है। अदालत ने कहा कि प्रदेश विधानपालिका मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव की नियुक्ति के मामले में कोई कानून नहीं बना सकती है।

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अदालत ने असम राज्य में सीपीएस के बनाए गए एक्ट को रद्द करने वाले बिमलांशू राय बनाम भारत सरकार की जजमेंट का हवाला देते हुए हिमाचल के सीपीएस के 2006 के एक्ट को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब अर्की विधानसभा क्षेत्र से संजय अवस्थी, दून से राम कुमार चौधरी, पालमपुर से आशीष बुटेल, रोहड़ू से मोहन लाल ब्राक्टा, बैजनाथ से किशोरी लाल और कुल्लू से सुंदर सिंह ठाकुर अब सिर्फ कांग्रेस के विधायक ही रहेंगे। ये सभी सीपीएस नियुक्त किए गए थे।


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सुविधाएं वापस ली
हाईकोर्ट ने मुख्य संसदीय सचिवों को पद से हटाने और सभी प्रकार की सुविधाएं और अधिकार भी वापस लेने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट के न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और विपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने इस एक्ट को निरस्त करने का फैसला सुनाया है। इससे पूर्व भी वर्ष 2005 में वीरभद्र सरकार में हिमाचल प्रदेश में सीपीएस एक्ट रद्द हुआ था। तब भी मुख्य संसदीय सचिवों को लाभ वाले पद छोड़ने पड़े थे। इसके बाद प्रदेश सरकार ने साल 2006 में नया एक्ट बनाया जो 2007 से लागू हुआ। प्रदेश में 11 दिसंबर 2022 को कांग्रेस की सरकार बनी थी। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने छह विधायकों को मुख्य संसदीय सचिव नियुक्त किया था। इसके खिलाफ भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और विधायक सतपाल सत्ती समेत अन्य भाजपा विधायकों ने हाइकोर्ट में याचिका दायर की थी।

याचिका में दी गई चुनाैति
इसमें सीपीएस की नियुक्ति को असांविधानिक बताते हुए चुनौती दी गई थी। भाजपा का आरोप था कि सरकार ने विधायकों को खुश करने के लिए सीपीएस नियुक्त किए हैं। बुधवार को हाईकोर्ट की खंडपीठ का फैसला आने के बाद याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने मीडिया से बातचीत में बताया कि हाईकोर्ट ने माना है कि हिमाचल प्रदेश संसदीय सचिव एक्ट 2006 मेंटेनेबल नहीं है। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिए हैं कि सीपीएस की सभी सुविधाएं वापस ली जाएं। हाइकोर्ट ने संसदीय सचिव एक्ट को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि कोर्ट का आदेश स्पष्ट है कि मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां नहीं हो सकती थीं और अब इन्हें पद से हटाना पड़ेगा। बता दें कि हाईकोर्ट ने 31 मई को हुई सुनवाई के बाद इसपर फैसला सुरक्षित रखा था।
 

सीपीएस को प्रतिमाह 2.20 लाख, विधायकों को 2.10 लाख वेतन
हिमाचल में सीपीएस को प्रतिमाह करीब 2.20 लाख वेतन मिलता है। सीपीएस का मूल वेतन 65 हजार रुपये है। इसके अलावा विधानसभा क्षेत्र भत्ता 90 हजार, दैनिक भत्ता 1,800, ऑफिस भत्ता 30 हजार, कंप्यूटर डाटा ऑपरेटर के लिए 15 हजार रुपये भत्ता मिलता है। इसके अलावा अन्य भत्ते दिए जाते हैं। सब भत्ते मिलाकर ये वेतन 2.20 लाख रुपये प्रति महीना पहुंच जाता है। इसके अलावा सीपीएस को गाड़ी, स्टाफ अलग से मुहैया करवाया जाता है। विधायकों और सीपीएस के वेतन में दस हजार रुपये का अंतर है। विधायकों का वेतन और भत्ते प्रतिमाह 2.10 लाख रुपये हैं।

मंत्रियों से पहले हो गई थी मुख्य संसदीय सचिवों की शपथ
8 जनवरी 2023 को हिमाचल प्रदेश में सात मंत्रियों को शपथ दिलाई जानी थी। मंत्रियों की शपथ वाले दिन उनसे पहले मुख्यमंत्री ने छह सीपीएस के शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन कर सभी को चौंका दिया था। मुख्य संसदीय सचिवों को राज्य सचिवालय में शपथ दिलाई थी। इसके बाद राज्यपाल ने मंत्रियों को राजभवन में शपथ दिलाई।

फैसले को सुप्रीम कोर्ट में देंगे चुनाैती
मुख्य संसदीय सचिवों के मामले में हाईकोर्ट के आदेश पर एडवोकेट जनरल अनूप कुमार रतन ने कहा कि सीपीएस को चुनौती देने वाली याचिका को हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया है और मुख्य संसदीय सचिवों और संसदीय सचिवों को उनके पदों से तुरंत प्रभाव से हटाने का आदेश दिया है। उनकी सभी सुविधाएं भी निरस्त कर दी गई हैं। राज्य विधानसभा के पास यह अधिनियम लाने का कोई अधिकार नहीं था। उन्होंने कहा कि कोर्ट ने एक्ट को अवैध घोषित कर दिया है। कोर्ट ने व्याख्या दी है कि जैसे आसाम विधानसभा को एक्ट बनाने की शक्ति नहीं थी, वैसे ही हिमाचल विधानसभा को भी शक्ति नहीं थी। कहा कि व्यक्तिगत रूप से भी सीपीएस और पीएस हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। सरकार के स्तर पर यह फैसला लिया जाना है। 

सीपीएस नियुक्ति रद्द होने पर सीएम सुक्खू ने ये कहा
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने छह मुख्य संसदीय सचिवों को हटाने के उच्च न्यायालय के आदेश पर कहा, "मैंने अभी तक निर्णय नहीं पढ़ा है। मैं अभी यहां आया हूं, लेकिन यदि ऐसा कोई निर्णय होता है, तो हम उसका अध्ययन करेंगे और फिर अपने मंत्रिमंडल के साथ चर्चा करने के बाद निर्णय लेंगे।" सीएम सुक्खू बुधवार शाम को धर्मशाला पहुंचे। इस दाैरान उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में यह जानकारी दी।

 

कार्मिक विभाग ने सीपीएस से हटाया स्टाफ,राज्यपाल से मिलेगी भाजपा
हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रदेश सरकार ने मुख्य संसदीय सचिव से स्टाफ हटाने के निर्देश जारी कर दिए हैं। वरिष्ठ निजी सचिव भूरी सिंह राणा, तहमीना बेगम और विशेष निजी सचिव सत्येंद्र कुमार को वापस बुलाया गया है। अब कार्मिक विभाग की ओर से इनकी अलग से नियुक्ति के आदेश जारी किए जाएंगे। राज्यपाल से मंजूरी के बाद यह फैसला लिया गया है। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं सांसद डॉ. राजीव भारद्वाज की अगुवाई में पार्टी का प्रतिनिधिमंडल वीरवार को राज्यपाल से मिलेगा। इस दौरान भाजपा उपाध्यक्ष संजीव कटवाल, प्रदेश प्रवक्ता चेतन बरागटा, पार्टी कोषाध्यक्ष कमल सूद और प्रदेश मीडिया प्रभारी करण नंदा मौजूद रहेंगे। डॉ. भारद्वाज ने बताया कि यह उनकी राज्यपाल के साथ राजभवन में औपचारिक तौर पर पहली मुलाकात होगी। इस दौरान मौजूदा घटनाक्रम पर चर्चा की जाएगी। कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा राज्यपाल को पत्र सौंपकर सीपीएस की नियुक्ति निरस्त होने के बाद इन छह विधायकों की विधायकी खत्म करने की मांग उठा सकती है।

सीपीएस बनाने का फैसला असांविधानिक था: जयराम
नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व सीएम जयराम ठाकुर ने कहा कि भाजपा पहले दिन से ही सीपीएस बनाने के फैसले के खिलाफ थी क्योंकि यह असांविधानिक था और  संविधान के विरुद्ध निर्णय था। जब 2017 में हम सरकार में थे तो हमारे समय भी यह प्रश्न आया था। तो हमने इसे पूर्णतया असांविधानिक बताते हुए सीपीएस की नियुक्ति नहीं की थी। आज हाईकोर्ट की ओर से फिर से सरकार के तानाशाही पूर्ण और असांविधानिक फैसले को खारिज कर दिया। मांग करते हैं कि इस पद का लाभ लेने वाले सभी विधायकों की सदस्यता भी समाप्त हो।

प्रदेश में अब ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के दायरे में आएंगी सीपीएस की नियुक्तियां : हाईकोर्ट 
हिमाचल हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि प्रदेश में सीपीएस/पीएस की नियुक्ति का कानून फैसला आने तक लागू था। अयोग्यता अधिनियम 1971 के तहत सीपीएस/ पीएस की नियुक्तियों को संरक्षण दिया गया था, लेकिन इस फैसले के बाद मुख्य संसदीय सचिवों व संसदीय सचिवों की नियुक्ति को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट माना जाएगा। एेसे में यदि अब सीपीएस नियुक्त होते हैं, तो उनकी विधायकी भी जाएगी।

विमलांक्षु राॅय बनाम असम सरकार केस का दिया हवाला
 दोपहर बाद 2:00 बजे जैसे ही हाईकोर्ट की खंडपीठ बैठी, पूरा कोर्ट अधिवक्ताओं और मीडिया कर्मियों से भरा था। न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी ने फैसला सुनाते हुए सीधा ही विमलांक्षु राॅय बनाम असम सरकार केस का हवाला देते हुए हिमाचल प्रदेश की ओर से बनाए गए सीपीएस/पीएस कानून-2006 को अवैध घोषित कर दिया। इसके साथ ही मुख्य संसदीय सचिवों को दी जाने वाली सारी सुविधाओं को तुरंत हटाने के आदेश दिए। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि वीरवार से इनके आवास और सीपीएस से जुड़ीं सुविधाएं वापस ली जाएं। 
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नियुक्तियों के िखलाफ दायर की थीं तीन याचिकाएं 
हाईकोर्ट में सबसे पहले भाजपा सरकार में पीपल फॉर रिस्पांसिबल गवर्नेंस ने मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका में कहा गया कि विधानपालिका के पास इस मामले में कानून बनाने का अधिकार नहीं है। सरकार ने इस कानून को बनाकर जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल दिया है। इस मामले में दो अन्य अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई थीं। इनमें से एक भाजपा नेता सतपाल सत्ती और दूसरी कल्पना की ओर से दायर की गई थी। 
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