इतनी राशि चुकाने में असमर्थता जताते हुए पंजाब ने ऑफर दिया था कि इस बकाये की वसूली अगर हिमाचल चाहे तो अगले 20 साल तक बीबीएमबी के प्रोजेक्टों में पंजाब के हिस्से की बिजली बेचकर कर सकता है।
हिमाचल सरकार ने पंजाब के इस ऑफर को इसी साल जनवरी में हुई कैबिनेट की बैठक में मंजूर करते हुए 20 साल की जगह 10 साल में वसूली करने पर सहमति जताई थी।
दस साल के भीतर 13066 मिलियन यूनिट बिजली बेचकर अपना बकाया वसूलने का फैसला हुआ। कैबिनेट के फैसले से हिमाचल सरकार ने पंजाब को भी अवगत करवाया। पहले तो पंजाब इस फैसले को मानने को तैयार हो गया था, लेकिन अब इस बाबत हाथ खींच लिए हैं।
बीते दिनों शिमला में हुई देश के ऊर्जा मंत्रियों की बैठक में इस मामले को लेकर कोई फैसला नहीं हो सका। ऐसे में अब हिमाचल सरकार ने इस मामले को दोबारा सुप्रीम कोर्ट ले जाने की तैयारी की है।
पुनर्गठन के दौरान पंजाब के कुछ क्षेत्र हिमाचल में शामिल हो गए थे। पुनर्गठन से पूर्व बीबीएमबी प्रोजेक्टों में पहले हिमाचल का महज 2.50 प्रतिशत ही हिस्सा था। पंजाब री-ऑर्गेनाइजेशन एक्ट 1966 के तहत हिमाचल में आने वाले बीबीएमबी प्रोजेक्टों में सूबे का 7.19 प्रतिशत हिस्सा बना।
इसके लिए प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट गई। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल के दावे को सही ठहराते हुए 7.19 प्रतिशत हिस्सा देने के आदेश दिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हिमाचल सरकार ने 7.19 प्रतिशत हिस्से के हिसाब से 4249 करोड़ एरियर का दावा किया था।
हिमाचल झेल रहा विस्थापन का दर्द- बीबीएमबी के तहत सतलुज पर भाखड़ा और ब्यास नदी पर पौंग बांध बनने से सबसे ज्यादा विस्थापन का दंश हिमाचल के लोगों ने झेला। अब भी लोग मुआवजे की लड़ाई लड़ रहे हैं। जबकि हिमाचल की नदियों के पानी और बिजली का फायदा चार राज्य पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली उठा रहे हैं।