डॉ. कुलदीप सिंह तनवर
बंदरों को वर्मिन घोषित करने के बाद सरकार नसबंदी के नाम पर पैसा बहा रही है। भले ही सरकार बंदरों का आंकड़ा घटाकर पेश कर रही है, लेकिन वास्तव में अभी भी प्रदेश में करीब पांच लाख बंदर हैं। हिमाचल किसान सभा का सवाल है कि जब बंदरों को वर्मिन घोषित किया जा चुका है तो नसबंदी की क्या जरूरत है? सरकार बंदरों का निर्यात क्यों नहीं कर रही है।
किसान सभा ने सरकारों से तीन सवाल पूछे हैं। नाहन में पत्रकारों से बातचीत में किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह तनवर ने वर्तमान और पूर्व सरकार को घेरते हुए कहा कि बंदरों के विषय को लेकर सरकारें मौन रही हैं। किसान सभा के प्रयासों के बाद पूरे देश में विभिन्न राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में बंदरों को वर्मिन घोषित किया गया है। जब बंदरों को मारने की इजाजत दी गई है तो सरकार उनका निर्यात क्यों नहीं कर सकती।
डॉ. तनवर ने कहा कि प्रदेश में 8 नसबंदी केंद्र खोले गए हैं। इनमें बंदरों की नसबंदी की जा रही है। सवाल किया कि जब बंदरों को मारने की स्वीकृति है तो नसबंदी की क्या जरूरत है। सरकार का दावा है कि बंदरों की नसबंदी पर 30 करोड़ खर्चे गए हैं। वर्मिन घोषित किए जाने के बाद बंदरों की नसबंदी पैसे की बर्बादी है। उन्होंने साफ किया कि 1978 से पूर्व बंदरों का निर्यात होता था।
इसके बाद सरकारों ने कोई रुचि नहीं दिखाई। कहा कि इस विषय पर हिमाचल किसान सभा बहस के लिए भी तैयार है। इससे पूर्व हिमाचल किसान सभा की बैठक भी हुई, जिसमें कई पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया। जिला अध्यक्ष रमेश वर्मा, जिला महासचिव गुरविंदर सिंह, जिला कोषाध्यक्ष बलदेव सिंह, वरिष्ठ पदाधिकारी विश्वनाथ शर्मा, जगदीश, बाबूराम, नारायण सिंह आदि उपस्थित रहे।