इसरो के वैज्ञानिक दावा कर चुके हैं कि हिमालय के ग्लेशियर 1965 के बाद 4340 मीटर सिकुड़ चुके हैं। अभी भी हर साल सिकुड़ रहे हैं। ग्लेशियर छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गए हैं, जिससे इसका 10 फीसदी हिस्सा ही गायब हो गया है।
वैज्ञानिकों का दावा है कि वैश्विक तापमान की तुलना में हिमालय में आठ गुना वृद्धि हुई है जो ग्लेशियरों के लिए खतरनाक साबित हो रहा है।
जंगलों की आग भी कारण
हिमालयी जंगलों में आग की घटनाएं ग्लेशियरों के लिए नया खतरा है। आग के धुएं से ग्लेशियर के ऊपर जमी कच्ची बर्फ तेजी से पिघलने लगती है।
इसके दूरगामी प्रभाव पड़ते हैं। काला धुआं कार्बन के रूप में ग्लेशियरों पर जम जाता है, जो भविष्य में उस पर नई बर्फ को टिकने नहीं देता है।
बारिश के पानी का संग्रह करना लाभदायक होगा। चेक डैम बनाने से हिमखंडों का गिरना भी काफी हद तक रुक सकता है। क्षेत्र में पर्यावरण के हिसाब से पौधरोपण करना भी सार्थक सिद्ध होगा। अगर प्रदेश सरकार ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रही है तो यह पर्यावरण के लिए बेहतर होगा। - डॉ. जेसी कुनियाल, वरिष्ठ वैज्ञानिक, जीबी पंत राष्ट्रीय पर्यावरण एवं शोध संस्थान