प्रदेश में प्रशिक्षित काउंसलरों और मनोवैज्ञानिकों की कमी से मध्यस्थता मात्र औपचारिकता है। दुर्गम पहाड़ी रास्ते और सामाजिक कलंक महिलाओं के लिए न्याय पाना कठिन बनाते हैं। कई जिलों में फैमिली कोर्ट का काम अलग न्यायिक अधिकारी के पास नहीं है। शिमला में पॉक्सो न्यायाधीश और हमीरपुर में सत्र न्यायाधीश ही फैमिली कोर्ट की जिम्मेदारी संभालते हैं। परिवार न्यायालयों का मुख्य उद्देश्य केवल फैसला सुनाना नहीं, बल्कि पति-पत्नी या परिवार के बीच समझौते की संभावना तलाशना है। फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 9 अदालत को समझौते का प्रयास करने का अधिकार देती है।
धारा 6 में काउंसलरों व विशेषज्ञों की सहायता लेने का प्रावधान है। इसके बावजूद प्रदेश में पूर्णकालिक काउंसलरों की कमी है। कई स्थानों पर काउंसलर अनुबंध या अंशकालिक आधार पर काम कर रहे हैं। कुछ जगह गैर-विशेषज्ञ लोग भी काउंसिलिंग में मदद कर रहे हैं। शिमला, धर्मशाला में मध्यस्थता केंद्र होने के बावजूद प्रशिक्षित पारिवारिक मध्यस्थों की कमी है। इसका असर भरण-पोषण और बच्चों की कस्टडी जैसे मामलों पर पड़ता है। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के शोधार्थी परवीन कुमार और सहायक प्रोफेसर दिव्या गुप्ता ने यह अध्ययन किया है। उनका शोध पत्र फैमिली कोर्ट्स इन इंडिया: फंक्शनिंग एंड इफेक्टिवनेस विद स्पेशल रेफरेंस टू द स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ लॉ के वर्ष 2026 अगस्त के खंड 12 में प्रकाशित हुआ है। शोध में परिवार न्यायालयों की आधारभूत सुविधाओं पर सवाल उठाए गए हैं।
उधर, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण मामलों में देरी पर चिंता जताई है। हाईकोर्ट ने कहा कि मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने से कानूनी उद्देश्य कमजोर होता है। बच्चों की कस्टडी में उनके भावनात्मक, शैक्षणिक और मनोवैज्ञानिक हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। अध्ययन का निष्कर्ष है कि केवल अदालतों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है।