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Himachal Family Court: पति-पत्नी विवाद और बच्चों की कस्टडी में क्यों हो रही देरी? अध्ययन में खुलासा; जानें

Mon, 17 Aug 2026 12:24 PM IST
Ankesh Dogra विश्वास भारद्वाज, शिमला।

सार

हिमाचल में पति-पत्नी विवाद, भरण-पोषण और बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में देरी को लेकर हुए अध्ययन में कई चुनौतियां सामने आई हैं। शिमला, धर्मशाला और मंडी की फैमिली कोर्ट के विश्लेषण में बार-बार तारीखें, प्रशिक्षित काउंसलरों की कमी, अतिरिक्त न्यायिक प्रभार और आधारभूत सुविधाओं का अभाव प्रमुख समस्याएं बताए गए हैं। अध्ययन ने स्थायी काउंसलर और बेहतर मध्यस्थता व्यवस्था की जरूरत बताई है।
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फैमिली कोर्ट (सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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हिमाचल में पति-पत्नी के विवाद और बच्चों की अभिरक्षा जैसे मामले समय पर नहीं सुलझ पा रहे हैं। बेशक परिवार न्यायालय सुलह और त्वरित न्याय के लिए बनाए गए हैं लेकिन बार-बार तारीखें अड़चन बनी हैं। परिवार न्यायालयों की कार्यप्रणाली पर हुए एक ताजा अध्ययन में यह सामने आया है। इसमें शिमला, धर्मशाला और मंडी की फैमिली कोर्ट के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। पारिवारिक विवादों को सुलह और संवेदनशीलता से निपटाना आवश्यक है लेकिन हिमाचल में अलग भवनों की कमी है और न्यायाधीशों के पास अतिरिक्त प्रभार है। इससे मामलों पर विशेष ध्यान नहीं मिल पा रहा।

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प्रदेश में प्रशिक्षित काउंसलरों और मनोवैज्ञानिकों की कमी से मध्यस्थता मात्र औपचारिकता है। दुर्गम पहाड़ी रास्ते और सामाजिक कलंक महिलाओं के लिए न्याय पाना कठिन बनाते हैं। कई जिलों में फैमिली कोर्ट का काम अलग न्यायिक अधिकारी के पास नहीं है। शिमला में पॉक्सो न्यायाधीश और हमीरपुर में सत्र न्यायाधीश ही फैमिली कोर्ट की जिम्मेदारी संभालते हैं। परिवार न्यायालयों का मुख्य उद्देश्य केवल फैसला सुनाना नहीं, बल्कि पति-पत्नी या परिवार के बीच समझौते की संभावना तलाशना है। फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 9 अदालत को समझौते का प्रयास करने का अधिकार देती है।

धारा 6 में काउंसलरों व विशेषज्ञों की सहायता लेने का प्रावधान है। इसके बावजूद प्रदेश में पूर्णकालिक काउंसलरों की कमी है। कई स्थानों पर काउंसलर अनुबंध या अंशकालिक आधार पर काम कर रहे हैं। कुछ जगह गैर-विशेषज्ञ लोग भी काउंसिलिंग में मदद कर रहे हैं। शिमला, धर्मशाला में मध्यस्थता केंद्र होने के बावजूद प्रशिक्षित पारिवारिक मध्यस्थों की कमी है। इसका असर भरण-पोषण और बच्चों की कस्टडी जैसे मामलों पर पड़ता है। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के शोधार्थी परवीन कुमार और सहायक प्रोफेसर दिव्या गुप्ता ने यह अध्ययन किया है। उनका शोध पत्र फैमिली कोर्ट्स इन इंडिया: फंक्शनिंग एंड इफेक्टिवनेस विद स्पेशल रेफरेंस टू द स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ लॉ के वर्ष 2026 अगस्त के खंड 12 में प्रकाशित हुआ है। शोध में परिवार न्यायालयों की आधारभूत सुविधाओं पर सवाल उठाए गए हैं। 

उधर, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण मामलों में देरी पर चिंता जताई है। हाईकोर्ट ने कहा कि मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने से कानूनी उद्देश्य कमजोर होता है। बच्चों  की कस्टडी में उनके भावनात्मक, शैक्षणिक और मनोवैज्ञानिक हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। अध्ययन का निष्कर्ष है कि केवल अदालतों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। 
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घरेलू हिंसा शारीरिक मारपीट तक ही सीमित नहीं 
समाजशास्त्री प्रोफेसर मोहन झारटा ने कहा कि घरेलू हिंसा शारीरिक मारपीट तक ही सीमित नहीं होती। इसमें मानसिक, भावनात्मक, यौन और आर्थिक उत्पीड़न भी शामिल होता है। परिवार न्यायालयों में देरी सिर्फ न्यायिक समस्या नहीं, बल्कि इसका असर परिवार की सामाजिक संरचना, बच्चों के भविष्य और रिश्तों की स्थिरता पर भी पड़ता है। एचपीयू के विधि विभाग के पूर्व डीन प्रो. रघुविंदर सिंह ने कहा कि हिमाचल के हर जिले में फैमिली कोर्ट की सुविधा उपलब्ध नहीं है। कुछ जिलों के लिए सामूहिक रूप से फैमिली कोर्ट चल रहे हैं। पर्याप्त और स्थायी काउंसलर सुविधा भी बेहद जरूरी है।

पारिवारिक मामलों के त्वरित व संवेदनशील समाधान के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। न्यायालयों में आधारभूत ढांचा मजबूत करने और काउंसलरों की नियमित व्यवस्था के लिए हाईकोर्ट प्रशासन के साथ मिलकर कदम उठाए जाएंगे। - आरडी नजीम, अतिरिक्त मुख्य सचिव, गृह हिमाचल
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