यह पूरा मामला दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्हें लोक निर्माण विभाग में काम करते समय पर काल्पनिक ब्रेक दे कर सेवा से बाहर रखा गया था। लेबर कोर्ट ने माना कि विभाग की ओर ऐसा करना गलत और अवैध था। कोर्ट ने आदेश दिया कि इन कर्मचारियों की वरिष्ठता शुरुआती नियुक्ति की तारीख से ही गिनी जाए और इन्हें उनके जूनियर कर्मचारियों के नियमित होने की तारीख से नियमितीकरण का लाभ दिया जाए। आदेश के बाद सरकार ने कागजों पर तो इन कर्मचारियों को साल 2012 से नियमित कर दिया, लेकिन उन्हें उस अवधि (2012 से 2015) का वेतन और एरियर देने से मना कर दिया। सरकार का तर्क था कि चूंकि लेबर कोर्ट ने पुराने वेतन देने से मना किया था, इसलिए यह लाभ भी नहीं दिया जाएगा।