हाल ही में हिमाचल में विधानसभा चुनाव में बुरी तरह से हारी कांग्रेस के लक्ष्य में अगले लोकसभा चुनाव हैं। यही वजह है कि जयराम सरकार के पहले बजट सत्र में शुरू से ही कांग्रेस आक्रामक बनी हुई है और नहले पर दहला फेंक रही है। सत्र के पहले दिन धारा 118 को मुद्दा बनाने के बाद दूसरे दिन बुधवार को कांग्रेस ने राजनीतिक रंजिश से थोक में तबादले करने पर सरकार को घेरा।
माना जा रहा है कि पांच साल पुरानी भाजपा की शैली में ही विपक्षी पार्टी मौजूदा सत्र के साथ आगामी सत्रों में भी हमलावर दिख सकती है। पांच साल पहले वीरभद्र सरकार के प्रथम बजट सत्र में प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में भाजपा का यही रुख था। भाजपा के टारगेट में तब वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव थे।
अतीत में झांकें तो 12 मार्च 2013 को शुरू हुए वीरभद्र सरकार के पहले बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष धूमल के नेतृत्व में भाजपा ने प्रश्नकाल से पहले ही स्थगन प्रस्ताव के नोटिस पर ठीक वैसे ही चर्चा मांगी थी, जैसे कांग्रेस ने मांगी। पटकथा एक जैसी है, केवल विषय बदले हुए हैं।
तब भाजपा ने सत्र के पहले दिन फ ोन टैपिंग मामले में बैठाई जांच पर सारा काम रोककर चर्चा मांगी थी। दरअसल, वीरभद्र सरकार ने सत्ता में आते ही पूर्व की धूमल सरकार पर गैर कानूनी तरीके से फोन टैप करने के आरोप में रिकॉर्ड जब्त कर जांच बैठाई थी।
हालांकि, तब 12 मार्च को शुरू हुए सत्र के तीसरे दिन ही 14 मार्च को बजट पेश कर गतिरोध कुछ समय के लिए टल गया, पर आगे हंगामा भी जारी रहा। बात वीरभद्र सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरने तक बढ़ गई थी। 2014 से पहले भाजपा के खाते में चार में से केवल दो सीटें ही थीं। मोदी लहर में वर्ष 2014 में भाजपा ने तब लोकसभा की चारों सीटों पर जीत हासिल कर कांग्रेस का सूपड़ा साफ किया था।
अपनी आक्रामकता से तमाम विपरीत स्थितियों में कांग्रेस ऐसा कर पाएगी या नहीं, ये तो भविष्य के गर्भ में छिपा है। मगर भाजपा को घेरने का कोई मौका इस बजट सत्र में भी नहीं छोड़ना चाहेगी। आगामी दिनों में भी कांग्रेस कई अन्य मुद्दों पर भी सरकार को घेरेगी। तीसरे दिन वीरवार को भी कांग्रेस का रुख तीखा ही रह सकता है।
विपक्ष की रणनीति का तोड़ तलाश रही सरकार
विधानसभा में विपक्षी दल कांग्रेस के वाकआउट चक्रव्यूह में भाजपा सरकार उलझती दिख रही है। सरकार यह साबित करने में लगी है कि विपक्ष जिन मुद्दों पर हंगामा बरपा रहा है, वे केवल सुर्खियों में आने के हथकंडे हैं। धारा 118 के सरलीकरण को भुनाने के बाद तबादला उद्योग पर हंगामा सत्ता पक्ष के गले से नीचे नहीं उतर रहा।
सदन के भीतर इस जंग को भाजपा दो माह की सरकार बनाम पांच वर्ष के कांग्रेस कार्यकाल बनाने की कोशिश अभी उतनी कारगर नहीं रही। दूसरी तरफ, विपक्ष की रणनीति पर सत्ता पक्ष की तमाम दलीलें बेअसर हैं। कांग्रेस तय एजेंडे पर काम कर रही है। सदन में सत्ता पक्ष की एक जुटता की रणनीति का जवाब कम संख्या बल वाला विपक्ष वाकआउट अस्त्र से दे रहा है। इसका असर यह है कि मुख्यमंत्री के पहले दिन के तीखे तेवर दूसरे दिन नरम पड़े।
अब भाजपा के रणनीतिकार इसमें जुटे हैं कि सदन के भीतर और बाहर विपक्ष के दांवपेंच से कैसे निपटा जाए। भाजपा के तमाम होमवर्क के बावजूद कांग्रेस सदन में हंगामा कर अपने मंसूबे पर खरी उतर रही है। मुख्यमंत्री जयराम ने विपक्ष को घेरने के लिए अपने विधायकों के साथ कई बैठकें कीं, लेकिन सदन के भीतर विपक्ष को रोकने में कामयाब नहीं रहे।
सत्ता पक्ष की इस दलील को खारिज नहीं किया जा सकता कि जिन मामलों पर विपक्ष नियम 67 में स्थगन प्रस्ताव ला रहा है, उन पर ऐसी व्यवस्था नहीं दी जा सकती। दूसरी तरफ, नियम 67 की व्यवस्था पहले दिन ही विधानसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट कर दी, लेकिन विपक्ष का असल मकसद सरकार को हंगामे कर भड़काने का है, जिसमें उसे पहले दो दिन कामयाबी भी मिली। विपक्ष के उठाए मुद्दों को नजरअंदाज करने की रणनीति पर चलना भाजपा सरकार के लिए आसान नहीं है।
धरा रह गया होमवर्क
भाजपा सरकार की चिंता इस बात से है कि विपक्ष जिन विषयों पर हंगामा कर रहा है, उसके जवाब के लिए पूरा होमवर्क किया जा रहा है। सरकार हंगामे के बीच अपना पक्ष रखने की कोशिश भी कर रही है, लेकिन विपक्ष उसे अनसुना कर वाकआउट कर रहा है। धारा 118 पर भी मुख्यमंत्री जयराम तमाम दस्तावेज साथ लेकर आए थे। तबादलों को लेकर लगे आरोपों पर भी उनके पास पिछली सरकार के तमाम तथ्य थे।
बड़ी चिंता नौ मार्च की
विपक्ष के रवैये से नाराज सत्ता पक्ष अपने विधायकों के साथ दूसरे दिन भी सत्र के बाद बैठक में जुटा। जयराम सरकार की बड़ी चिंता नौ मार्च को सरकार के बजट पेश करने को लेकर है। पूरा सत्र सीएम के बजट भाषण पर टिका है। विपक्ष जिस तरह से हंगामा कर रहा है, उसका असर बजट पेश करते समय न दिखे, इसके लिए हर दिन सत्र के बाद विधायकों को बुलाकर समझाया जा रहा है।