हिमाचल की राजनीति में तीसरा मोर्चा आज तक अपने लिए सियासी जमीन तलाश नहीं सका है। कांग्रेस और भाजपा से अलग होकर तीसरा विकल्प देने के अब तक किए गए सभी प्रयोग असफल रहे हैं। हिमाचल विकास कांग्रेस और हिमाचल लोकहित पार्टी ने तीसरा मोर्चा खड़ा करने का प्रयास किया था, लेकिन बाद में दोनों दलों का कांग्रेस और भाजपा में विलय हो गया।
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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी प्रदेश के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव लड़ने तक सीमित है। आम आदमी पार्टी ने इस साल विधानसभा चुनाव में उतरने का दम तो भरा था, लेकिन अब दमदार नेतृत्व नहीं मिलने के चलते पार्टी ने चुनाव से हाथ खींच लिए हैं।
हिमाचल की राजनीति में तीसरे मोर्चे को अस्तित्व में लाने के प्रयास हर बार फेल हुए हैं। कांग्रेस और भाजपा ही हर बार बड़े दल बनकर उभरे हैं। जब भी तीसरा मोर्चा बनाने की पहल हुई तो मुख्यधारा के इन दोनों दलों से रूठे या असंतुष्ट नेताओं ने ही यह शुरुआत की।
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1990 में जनता दल ने जीती थीं 11 सीटें
पंडित सुखराम
- फोटो : File Photo
जनता दल ने साल 1990 में 11 सीटें जीती थीं, पर उस समय भाजपा 46 सीटें जीतकर बहुमत में थी। कांग्रेस की तब 11 सीटों पर ही विजय हुई थी। एक सीट निर्दलीय और एक माकपा ने जीती थी। तब जनता दल के प्रमुख नेता रामलाल ठाकुर, मेजर विजय सिंह मनकोटिया थे। उस समय भाजपा सरकार बनाने में सक्षम थी।
1998 में हिविकां के खाते में आईं 5 सीटें
तीसरे विकल्प का प्रभावशाली दखल केवल साल 1998 में पंडित सुखराम की हिविकां के सहयोग से बनी भाजपा सरकार में ही देखा गया। 1998 में हिमाचल विकास कांग्रेस के रूप में पंडित सुखराम के नेतृत्व में तीसरा मोर्चा बना। हिविकां के पांच विधायक बने।
उस समय भाजपा और कांग्रेस की 31-31 सीटों पर जीत हुई। हिविकां के सहयोग से तब मुख्यमंत्री प्रेमकुमार धूमल के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। हिविकां समर्थित भाजपा सरकार ने अपना कार्यकाल तो पूरा किया, मगर बाद में हिविकां का भी कांग्रेस में विलय हो गया। पंडित सुखराम अपनी पुरानी पार्टी में लौट आए।
2007 में मनकोटिया बसपा लेकर आए
मेजर विजय सिंह मनकोटिया
- फोटो : File Photo
साल 2007 के चुनाव में उत्तरप्रदेश में बसपा की लहर हिमाचल तक पहुंची तो मेजर विजय सिंह मनकोटिया ने बसपा को तीसरे मोर्चे के रूप में खड़ा करने का प्रयास किया, लेकिन बाद में मनकोटिया खुद ही चुनाव हार गए। बसपा के खाते में केवल कांगड़ा की एक ही सीट आई। बसपा विधायक संजय चौधरी बाद में भाजपा में शामिल हो गए।
2012 में हिलोपा ने बनाया थर्ड फ्रंट
हिलोपा के रूप में भाजपा के असंतुष्ट महेश्वर सिंह का थर्ड फ्रंट बनाने का प्रयास भी असफल रहा। महेश्वर सिंह ने साल 2012 के चुनाव में नई पार्टी बनाकर 36 विधानसभा सीटों में चुनाव लड़ा था।
कई सीटों पर हिलोपा के समर्थन से माकपा के प्रत्याशी चुनावों में थे, लेकिन हिलोपा को जीत सिर्फ एक ही सीट पर मिली। साल 2016 में पार्टी बनाने के चार साल बाद महेश्वर सिंह भी अपनी पुरानी पार्टी भाजपा में जा मिले।
2.4 फीसदी वोट लेकर हिलोपा ने पिछले विधानसभा चुनावों में एक सीट जीती थी। तब हिलोपा का वोट शेयर माकपा, बसपा जैसे राजनीतिक दलों से ज्यादा रहा था। कांग्रेस और भाजपा के वोट बैंक में 3.34 फीसदी के अंतर से 10 सीटों का अंतर आया था।
तीसरे मोर्चे के वोट बैंक पर गौर करें तो यह 3.56 बनता है। इसमें हिलोपा और माकपा के वोट शामिल हैं। ये वोट बैंक भाजपा और कांग्रेस के जीत-हार के वोट बैंक के अंतर से ज्यादा है।
बीते चुनाव में कांग्रेस को 42.81 फीसदी, भाजपा को 38.47 फीसदी, हिलोपा को 2.40 फीसदी, माकपा को 1.16 फीसदी, बसपा को 1.17 फीसदी वोट मिले थे।