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विधानसभा चुनाव: हिमाचल की सियासत में दलित कार्ड का खेल

Fri, 29 Sep 2017 01:44 PM IST
राकेश शर्मा/अमर उजाला, सोलन
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अब तक जातिवाद से दूर प्रदेश की राजनीति में इस बार खुले मन से दलित कार्ड का खेल शुरू हो गया है। प्रदेश की 25 प्रतिशत आबादी को भेदने की मंशा दोनों बड़े दलों में साफ नजर आ रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने दलित सम्मेलनों की आड़ में पिछड़े और बेगाने फिर रहे इस वर्ग को एकदम खास बना दिया है।
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चुनाव से ठीक पहले हर जगह दलित समाज की पूछताछ प्रदेश में शुरू हो गई है, जबकि अब तक के राजनीतिक इतिहास में प्रदेश का चुनाव जातिवाद पर आधारित नहीं रहा। हालांकि, क्षेत्रवाद और टोपीवाद की सियासत जरूर यहां के मतदाताओं को याद है, लेकिन इस बार के चुनाव को जातिवाद के चश्मे से भी देखा जाएगा।

प्रदेश की 25 फीसदी आबादी को भेदने की मंशा

भाजपा ने प्रदेश में दलित सम्मेलनों की शुरुआत की थी। एक के बाद एक कई सम्मेलन खासतौर पर ऐसे विधानसभा क्षेत्रों में किए गए, जो अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित थे। अनुसूचित जाति की घनी आबादी वाली जगहों पर भी छोटी-छोटी सभाएं की गईं।

भाजपा ने सम्मेलनों में भारी भीड़ जुटने और दलित समाज के भारी संख्या में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने के दावे किए थे। इसके बाद कांग्रेस ने भी दलित सम्मेलन का जवाब भाजपा को उसी अंदाज में देना शुरू कर दिया।

इन सम्मेलनों का खास केंद्र इन दिनों सोलन जिला बना हुआ है। यहां सोलन सदर और कसौली दोनों विधानसभा क्षेत्र आरक्षित हैं। 
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इस बार खूब होगा दलित शब्द का प्रचलन

यहां पहले कुमारहट्टी में मुख्यमंत्री ने जनसभा की, जबकि उसके बाद सुबाथू में दलित सम्मेलन के माध्यम से समाज को कांग्रेस के साथ बांधे रखने का प्रयास किया गया है। सुबाथू में हुए दलित सम्मेलन में विधानसभा चुनाव में इस वर्ग की जरूरत साफ नजर आई।

नेता मंच से समाज को कांग्रेस के साथ जुड़े रहने और टूटकर भाजपा में शामिल हुए लोगों को वापस लाने की दुहाई देते रहे। बहरहाल, प्रदेश में शुरू हुए दलित कार्ड ने साफ कर दिया है कि इस बार चुनाव में राजनीतिक मुद्दों के साथ दलित शब्द का प्रचलन भी खूब होगा। फिर चाहे मंच किसी भी राजनीतिक दल का हो।
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