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हिमाचल में मोदी और राहुल से ज्यादा धूमल-वीरभद्र की साख दांव पर

Mon, 18 Dec 2017 10:39 AM IST
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, शिमला
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हिमाचल विधानसभा चुनाव परिणाम से दोनों प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस की प्रतिष्ठा से अधिक वीरभद्र सिंह और प्रेम कुमार धूमल की साख दांव पर है। प्रदेश की सियासत पिछले दो दशकों से धूमल और वीरभद्र के इर्द-गिर्द घूमती रही है। इस बार दोनों नेताओं ने अपने सियासी वजूद से अपनी पार्टियों को चुनावी रणनीति बदलने पर मजबूर किया।
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प्रधानमंत्री मोदी चेहरे को आगे रखकर चुनाव में उतरी भाजपा को आखिरी समय में धूमल को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना पड़ा। अब पार्टी की जीत-हार का बोझ उनके कंधों पर है। वहीं, वीरभद्र सिंह ने चुनाव नहीं लड़ने का दांव खेलकर हाईकमान से चुनाव की कमान अपने हाथ ले ली। राहुल गांधी ने वीरभद्र पर भरोसा जताकर केवल प्रचार के आखिरी दिन ही प्रदेश में कदम रखा।

वीरभद्र की साख केवल मिशन रिपीट से नहीं, बल्कि बेटे विक्रमादित्य को विधानसभा पहुंचाने से भी जोड़कर देखी जाएगी। उधर, धूमल की जीत-हार के भी कई सियासी मायने रहेंगे। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा समेत सीएम पद के तमाम दावेदारों को मात देकर उन्होंने मोदी और शाह से अपने नाम पर मुहर लगवाई। भाजपा की जीत-हार से धूमल परिवार का सियासी रसूख जुड़ गया है।
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किसके सर सजता है सत्ता का सेहरा

दोनों ओर के ‘दूल्हे’ तैयार हैं। बस देखना यह है कि सत्ता का सेहरा किसके सर सजता है। इस बार हिमाचल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को स्थानीय दिग्गजों वीरभद्र और धूमल के आगे झुकता दिखा। चुनाव से चार महीने पहले कांग्रेस दो धुरियों प्रदेश अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू और मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह में बंटी रही।

कांग्रेस को भाजपा से अधिक इन दोनों नेताओं के खेमों की एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी से नुकसान होता दिख रहा था। सियासी हठ के लिए विख्यात वीरभद्र सिंह ने सुक्खू को हटाने के साथ खुद को मुख्यमंत्री घोषित करने के लिए रिटायरमेंट लेने तक का दांव खेला। सुक्खू तो हटे नहीं, लेकिन राहुल ने मंडी जनसभा में उनको मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर चुनावी कमान सौंप दी।

हाईकमान का एक परिवार एक टिकट का फार्मूला भी वीरभद्र के बेटे विक्रमादित्य के कारण नाकाम हो गया। उलटा कैबिनेट मंत्री कौल सिंह भी अपनी बेटी चंपा को टिकटा दिलवा गए। टिकट आवंटन में भी वीरभद्र अपने अधिकांश करीबियों को टिकट दिलवाने में सफल रहे।

जिन्हें टिकट नहीं मिला, वे निर्दलीय मैदान में डट गए। प्रचार के फ्रंट पर वीरभद्र एक तरह से अकेले मोर्चा खोलते रहे। उधर, भाजपा जिस चुनावी रणनीति को लेकर मई माह से चली, उसमें कैबिनेट मंत्री जेपी नड्डा सब पर हावी दिखे। मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं करने का पार्टी निर्णय धूमल खेमे को रास नहीं आया।
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धूमल खेमे को रास नहीं आई नड्डा की सक्रियता

नड्डा की सक्रियता भी धूमल खेमे को रास नहीं आई। नड्डा और अनुराग ठाकुर के बीच बिलासपुर में प्रस्तावित एम्स पर जुबानी जंग भी हुई। प्रधानमंत्री मोदी को बिलासपुर बुलाकर नड्डा ने एम्स का उद्घाटन करवा अपना कद साबित किया। आचार संहिता लागू होने के बाद अंदरखाने दोनों खेमों में खींचतान तेज हुई।

धूमल ने टिकट आवंटन की प्रक्रिया में देरी पर सवाल खड़ा किया तो सबको अचरज हुआ। टिकट आवंटन में आंतरिक सर्वेक्षणों के साथ संघ की छाप दिखी। धूमल को उनकी सीट हमीरपुर से हटा सुजानपुर भेजने के कई मायने निकाले गए। माना गया कि भाजपा यूपी, गोवा और उत्तराखंड की तरह मुख्यमंत्री का चेहरा दिए बिना उतरेगी।

स्टार प्रचार शुरू होने के बाद धूमल कैंप का केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव काम आया। आंतरिक सर्वेक्षणों में भाजपा कमजोर बताई गई। कांग्रेस ने भाजपा को बिना दूल्हे की पार्टी करार दिया तो उसके जवाब में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने नाहन से घोषणा की भाजपा का दूल्हा धूमल होगा।

धूमल का नाम घोषित होते ही नड्डा खेमा बैकफुट पर आया। पार्टी के आंतरिक समीकरण बदल गए। अब नतीजे साबित करेंगे कि धूमल का भाजपा में विकल्प है या नहीं। इतना ही नहीं, उनके बेटे अनुराग का सियासी कद भी इससे जुड़ गया है। 

वर्ष 2012
कांग्रेस  - 36 
भाजपा - 26 
निर्दलीय - 5
हिलोपा - 1
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