हाईकोर्ट ने माना कि कलेक्टर के पास जिला अदालत के आदेश को चुनौती देने की कोई कानूनी क्षमता नहीं है। एक अर्ध-न्यायिक अधिकारी को यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह अपने ही कारण में न्यायाधीश बन जाए और उस आदेश को चुनौती दे जिसने उसके फैसले को बदला है। यह मामला वर्ष 1986 का है, जब शिमला के बालूगंज में एनसीसी कॉम्प्लेक्स और भवन के निर्माण के लिए सरकार ने लगभग 4976.8 वर्ग गज भूमि का अधिग्रहण किया था। भूमि अधिग्रहण कलेक्टर ने शुरू में जमीन, पेड़ों और ढांचे के लिए करीब 4 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था। जमीन के मालिकों (दावेदारों) ने इस मुआवजे को कम बताते हुए जिला अदालत फॉरेस्ट शिमला में चुनौती दी। दिसंबर 2010 में कोर्ट ने मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 411 रुपये प्रति वर्ग गज कर दिया। जिला अदालत के इस फैसले के खिलाफ भूमि अधिग्रहण कलेक्टर ने खुद हाईकोर्ट में अपील दाखिल की, जिस पर यह फैसला आया है।