हिमाचल हाईकोर्ट ने न्यायालय के समक्ष झूठे शपथपत्र के आधार पर कोर्ट को गुमराह कर अपने हक में अंतरिम राहत पाने वाले याचिकाकर्ता प्रताप सिंह वर्मा पर एक लाख रुपये कॉस्ट लगाने के आदेश पारित किए हैं। मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश तरलोक सिंह की खंडपीठ ने फैसले में कहा कि यह न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का ऐसा उदाहरण है जिसमें न्यायिक व्यवस्था से असंतुष्ट याचिकाकर्ता कानून की सत्ता का दुरुपयोग करने में कामयाब हो जाता है।
मामले के अनुसार प्रार्थी शिमला में एक वर्ष के लिए अनुबंध आधार पर 17 फरवरी 2014 को बतौर जिला बाल सुरक्षा अधिकारी नियुक्त हुआ। यह नियुक्ति केंद्रीय प्रायोजित योजना के तहत की गई थी। यह अनुबंध 19 मई 2015 से 18 नवंबर 2015 तक बढ़ाई गई। इसके बाद उनका अनुबंध आगे नहीं बढ़ाया गया। उन्होंने कांट्रेक्ट बढ़ाने के लिए तर्क देते हुए आवेदन किया कि उन जैसे अन्य अधिकारियों की अनुबंध अवधि बढ़ा दी गई है।
उनका आवेदन रद्द हुआ तो ट्रिब्यूनल में अनुबंध अवधि बढ़ाने के लिए आदेशों की गुहार लगाई। जब वहां बात नहीं बनी तो हाईकोर्ट में याचिका दायर की। अंतरिम राहत के लिए प्रार्थी ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट में याचिकाएं लगाता रहा। मौजूदा याचिका में शपथ पत्र के साथ बताया कि उनकी एक ही मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट के अलावा अन्य किसी अदालत में मामला लंबित नहीं है जबकि कोर्ट ने पाया कि उनकी इसी मुद्दे को लेकर ट्रिब्यूनल में भी आवेदन लंबित है, जिस पर फैसला आना बाकी है।