प्रतिवादी ने इस पर आपत्ति जताई थी कि उम्मीदवार का परिवार एक शिक्षण संस्था के माध्यम से सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का आरोपी है। इसी आधार पर 4 मई को रिटर्निंग अधिकारी ने हिमाचल प्रदेश नगर निगम एक्ट के तहत याचिकाकर्ता को अयोग्य घोषित कर दिया था। कोर्ट ने पाया कि प्रशासन की कार्रवाई में कई कानूनी खामियां हैं। प्रशासन ने साल 2014 की एक सीमांकन रिपोर्ट को आधार बनाया था, जिसे 10 साल तक ठंडे बस्ते में रखने के बाद अचानक 23 जनवरी 2024 को बिना किसी पक्ष को सुने कन्फर्म कर दिया गया। सहायक कलेक्टर ने पुरानी फाइल का हवाला देकर पक्षों को सुनने से मना कर दिया, जो कि भूमि राजस्व एक्ट की धारा 107 व लैंड रिकॉर्ड मैनुअल के विरुद्ध है। चुनाव अधिकारी ने नामांकन रद्द करते समय पंचायती राज अधिनियम की धाराओं का उल्लेख किया था, जबकि मामला नगर निगम अधिनियम के दायरे में आता था। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता के पिता की ओर से 2014 में दिए गए बयान को अतिक्रमण की स्वीकारोक्ति नहीं माना जा सकता, क्योंकि उन्होंने भूमि वापसी की प्रक्रिया लंबित होने की बात कही थी।