अपनी ही 2 वर्षीय बेटी से दुराचार मामले में दस साल की सजा काट रहे पिता को हाईकोर्ट ने बेकसूर करार देते हुए निचली अदालत के फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष ने मामले से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को जांचे परखे बिना ही एक बेकसूर को दोषी करार देकर सजा दिलवा दी।
न्यायाधीश धर्म चंद चौधरी व न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर की डबल बेंच ने स्पेशल जज चंबा के 12 अप्रैल 2016 के फैसले को खारिज करते हुए आरोपी पिता को तत्काल रिहा करने के आदेश जारी किए।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि भविष्य में इस तरह के मामलों में पुलिस, अभियोजन पक्ष और फैसला देने वाले जज कानून के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए अपने कर्तव्य का पालन करें। मामले की शिकायतकर्ता ने अपने पति पर अपनी 2 वर्ष से भी कम उम्र की बच्ची से दुराचार करने का आरोप लगाते हुए डीसी चंबा को पत्र लिखा था।
एडीएम चंबा ने इस पत्र को चंबा पुलिस थाने को भेजा जहां 10 फरवरी 2015 को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 व पॉस्को अधिनियम की धारा 4 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
पुलिस ने मामले की जांच के बाद निचली अदालत में चालान पेश कर दिया। अभियोजन पक्ष ने आरोपी को दोषी साबित कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अदालत ने जो पाया है वह शिकायतकर्ता और आरोपी की आपसी रंजिश से उपजी साजिश साबित हुई है। अदालत ने कहा, पुलिस ने इस मामले की तह तक जाने की जहमत भी नहीं उठाई।
जांच अधिकारी ने शिकायतकर्ता से न तो यह पूछा कि वह अपने पति से अलग क्यों रह रही थी और न ही यह जाना कि शिकायतकर्ता अपनी मां के साथ कितने समय से रह रही थी। जांच अधिकारी ने यह जांचना भी जरूरी नहीं समझा कि शिकायतकर्ता ने आरोपी पति के पिता व भाई के खिलाफ यौन शोषण की जो शिकायतें की हैं, वे सच हैं या फिर झूठ।
वास्तव में जांचकर्ता ने केवल शिकायतकर्ता की बातों पर ही विश्वास किया। हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने भी इन महत्वपूर्ण सवालों को नजरअंदाज करते एक ऐसे मामले में बेकसूर को सजा सुना दी जिसमें कोई साक्ष्य था ही नहीं।