आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ताओं से कम योग्य उम्मीदवार को नियुक्त किया गया है। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत में इसे लेकर दो याचिकाएं दायर की गई थीं। एक याचिका पंकज कुमार और दूसरी डॉ. सन्नी चौधरी की ओर से दायर की गई। अदालत ने दोनों याचिकाओं पर एक संयुक्त फैसला सुनाया, जिसमें उन्होंने यह निर्धारित किया कि क्या चयन समिति अपने आप में किसी भी उम्मीदवार को योग्य समकक्षता प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के लिए कह सकती है, जबकि विज्ञापन में समकक्ष योग्यता का कोई प्रावधान नहीं था। यह मामला 8 मार्च 2019 को सहायक प्रोफेसर के पदों को भरने के लिए जारी किए विज्ञापन से संबंधित है।
विज्ञापन के बाद निर्धारित समय के भीतर 49 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें से केवल पांच उम्मीदवारों के पास आवश्यक योग्यताएं थी। हालांकि, 32 उम्मीदवारों के आवेदन अंतिम रूप से स्वीकार कर लिए गए, जिनके पास कृषि जैव प्रौद्योगिकी में मास्टर डिग्री नहीं थी। उनकी उम्मीदवारी इस शर्त पर थी कि वह एमएससी (बायोटेक्नोलॉजी) की डिग्री को एमएससी के समकक्ष साबित करने वाले प्रमाणपत्र प्रस्तुत करेंगे। चयन समिति ने प्रतिवादी नंबर दो को नियुक्ति के लिए अनुशंसित किया, जबकि प्रतिवादी नंबर तीन और याचिकाकर्ता को क्रमवार प्रतीक्षा सूची में सीरियल नंबर वन और दो पर रखा गया।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि चयन समिति ने अपनी ओर से ही समकक्ष योग्यता को शामिल कर लिया, जो विज्ञापन में अधिसूचित आवश्यक योग्यता और विश्वविद्यालय के नियमों की विपरीत है। याचिका में मांग की गई थी कि विश्वविद्यालय को निर्देश दिया जाए कि प्रतिवादियों की ओर से जाली दस्तावेजों की सत्यता की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से करवाई जाए और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। दोनों मामलों में तथ्य और कानून के सामान्य प्रश्न शामिल हैं, जिसके आधार पर कोर्ट ने निर्णय एक सामान्य फैसले के माध्यम से पारित किया।
दवा, सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा रखी बरकरार
हाईकोर्ट ने मैक्लोडगंज के एक व्यक्ति की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायाधीश राकेश कैंथला ने निचली अदालतों की ओर से पारित सजा के फैसले को बरकरार रखा है। इसमें आरोपी को बिना लाइसेंस के एलोपैथी दवाएं रखना और बेचने के आरोप में दवा और सौंदर्य प्रसाधन मामला 2 (ड्रग एंड कॉस्मेटिक) अधिनियम में दोषी ठहराया गया था। अदालत ने कहा कि जब दवाई एक क्लीनिक के अंदर अलमारी पर रखी जाती है तो स्वाभाविक रूप से अनुमान लगाया जा सकता है कि वह बिक्री के लिए थी। अभियुक्त के पास दवाओं को रखने के लिए कोई लाइसेंस या प्रमाण पत्र नहीं था। अदालत ने कहा कि इलेक्ट्रोपैथी और इलेक्ट्रो होम्योपैथी को हिमाचल प्रदेश में मान्यता प्राप्त नहीं थी। अभियुक्त के पास एलोपैथी दवा को रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था। सजा को कम करने के तर्क को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि इस तरह के अपराधों का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। अदालत ने कहा कि ऐसे कृतियों को रोकने के लिए कठोर सजा आवश्यक है।