अगर आपका बच्चा चॉक, मिट्टी, राख, बाल, कागज, कपड़ा, बर्फ, प्लास्टर या अन्य चीज खाता हुआ दिखाई दे रहा है तो सावधान हो जाए। ये विकार बच्चों में पिका बीमारी का खतरा बढ़ा रहा है। शरीर में एनीमिया, कुपोषण, मानसिक तनाव, जिंक की कमी, ऑटिज्म और विकास संबंधी समस्याएं पिका बीमारी का कारण बन रहे हैं। बच्चा एनीमिया, कुपोषण और अन्य कमियों के कारण इन सब चीजों का सेवन करना शुरू कर देता है। इस विकार को अभिभावक बचपन की शरारत समझकर न टालें। इसके भविष्य में गंभीर परिणाम हो सकते हैं। दीन दयाल उपाध्याय जोनल अस्पताल शिमला के पीडियाट्रिक विभाग ने ओपीडी आने वाले मामलों की रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट में पिका से संबंधित कई गंभीर बीमारियां सामने आई हैं।
बीते दो वर्षों की रिपोर्ट के आधार में अध्ययन भी किया है। अध्ययन में पता चला है कि बीते कुछ वर्षों में मामले बढ़े हैं। पहले अस्पताल की ओपीडी में दो-तीन मामले आते थे लेकिन अब चार-पांच मामले आ रहे हैं। हैरत की बात तो ये है कि पिका बीमारी का लक्षण एक साल से शुरू हो रहा है। यह भी खुलासा हुआ है कि मानसिक तनाव में भी पिका बीमारी का विकार है। मानसिक तनाव के दौरान अधिकतर बच्चे बाल खाने का प्रयास कर रहे हैं।
अगर एक माह से अधिक खाते हैं तो इसे सामान्य आदत में नहीं लिया जा सकता है और तुरंत ध्यान देने के लिए कहा है ताकि बच्चे को गंभीर बीमारी से बचाया जा सके, साथ ही जांच करवाने का चिकित्सकों ने आग्रह किया है। वहीं, बीमारी की लक्षणों को देखकर उपचार भी चलता है। कई बार बच्चों के पेट और आंत से बालों के गुच्छे तक निकले हैं।
विशेषज्ञ बोले- न बच्चे को डांटें, न ही शर्मिंदा करें
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बच्चा इस तरह का विकार करता हुआ देखा जाता है तो डांटें नहीं और शर्मिंदा न करें बल्कि ऐसी वस्तुएं से उचित दूरी बनाएं। पौष्टिक एवं संतुलित आहार दें। स्थिति के असामान्य लगने पर तुरंत चिकित्सक की सलाह लें ताकि समय रहते गंभीर बीमारियों से बच्चों को बचाया जा सके। बच्चा अगर इस प्रकार की चीजें खाए तो पेट में कीड़े और संक्रमण, आंतों में रुकावट, दांतों को नुकसान या -बार-बार पेट दर्द और उल्टी की समस्या हो सकती है।
बच्चा चॉक, मिट्टी, राख, बाल, कागज, कपड़ा खाता है जो भोजन नहीं है तो पिका बीमारी का खतरा पैदा हो सकता है। छोटी उम्र में बच्चों पर ध्यान देना जरूरी है। अगर इस विकार से बच्चा पीड़ित है तो तुरंत चिकित्सक के पास लाए ताकि गंभीर स्थिति न बन सके। बच्चों को पौष्टिक एवं संतुलित आहार दें। -डॉ. अंकुर धर्माणी, बाल रोग विशेषज्ञ