हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर से गुच्छी का निर्यात अमेरिका, फ्रांस और इटली में होता है। इन देशों में इसकी अच्छी कीमत है। वहीं, हिमाचल प्रदेश में गुच्छी कुल्लू, मंडी, कांगड़ा, किन्नौर और सिरमौर के क्षेत्रों में पाई जाती है।
पहाड़ों में अलग-अलग धारणा
पहाड़ों में गुच्छी की अलग-अलग धारणा है। पहाड़ों में कुछ लोग इसे बिजली कड़कने की उपज मानते हैं तो कईयों का कहना है कि जंगलों में आग लगने के बाद गुच्छी उगती है। कई लोग कहते हैं कि यह मात्र कुंभ राशि वालों को ही मिलती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी भी गुच्छी के मुरीद रहे हैं। वाजपेयी जब भी हिमाचल आते थे तो इसकी सब्जी खाते थे। नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने पत्रकारों को बताया था कि उनकी सेहत का राज हिमाचल प्रदेश का मशरूम गुच्छी है। इसक अलावा औषधीय गुणों से भरपूर गुच्छी की विदेशों में भारी डिमांड है।
यूरोपियन देश फ्रांस, इंग्लैंड, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, कनाडा, अमेरिका और अन्य देशों में हिमाचल से भारी मात्रा में गुच्छी की सप्लाई की जाती है। सूबे के वन क्षेत्रों और बगीचों में प्राकृतिक तौर पर उगने वाली गुच्छी को औषधि के लिए यूरोपियन देशों को निर्यात किया जा रहा है। यूरोपियन देशों में गुच्छी हिमाचल के भाव से चार गुना अधिक दामों पर बेची जा रही है। गुच्छी को दिल और अन्य रोगों के लिए आयुर्वेद में रामबाण माना गया है।
कुल्लू, शिमला, किन्नौर और मंडी जिलों में गुच्छी की पैदावार प्राकृतिक तौर पर जंगलों और बगीचों में होती है। गुच्छी को औषधि के अलावा देश-विदेश के नामी पांच सितारा होटलों में विशेष डिश के तौर पर परोसा जाता है। अकेले कुल्लू जिले में ही हर वर्ष गुच्छी से ग्रामीण 12 से 15 करोड़ रुपये का कारोबार करते हैं जबकि हिमाचल में इसका कारोबार 70 करोड़ तक पहुंच जाता है।