कई लोगों के पास न जमीन बची है और न ही घर
इसके आसपास के कई लोगों के पास न जमीन बची है और न ही घर। पर्यटन, उद्योग के लिए फोरलेन सड़कें हिमाचल की जरूरत है, लेकिन इनके निर्माण की लापरवाही ने कई लोगों को बेघर कर दिया। हिमाचल में हजारों करोड़ रुपये की लागत से किरतपुर-मंडी-मनाली, परवाणू-शिमला, शिमला-मटौर और पठानकोट-मंडी फोरलेन का निर्माण कार्य चल रहा तीनों फोरलेन सड़कों के आसपास भारी नुकसान हुआ है। पहाड़ियों को चीरकर बनाए जा रहे किरतपुर-चूक के सबसे बड़े गवाह हैं। केंद्रीय राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने माना है कि किरतपुर-मनाली फोरलेन के आसपास तबाही के लिए डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) बनाने वाली एजेंसियां जिम्मेदार हैं। बिना विस्तृत अध्ययन के घर बैठे गूगल की मदद से डीपीआर बनाई जा रही हैं।
बर्बादी की कहानी बयां कर रहा सुंदरनगर के जयराम का परिवार
मंडी जिले के सुंदरनगर क्षेत्र के गांव चमुखा निवासी जयराम का परिवार बर्बादी की इस कहानी को बयां कर कर रहा है। किरतपुर-मनाली फोरलेन के किनारे जयराम का परिवार खुशी-खुशी रह रहा था। उनके घर से करीब 30 फीट दूर फोरलेन पर 90 डिग्री की सीधी कटिंग की गई। कंपैक्ट रोलर चला तो उनके घर में दरारें आ गईं। नेरचौक के भौर गांव के रहने वाले जोगिंद्र वालिया ने बताया कि फोरलेन से हुए भूस्खलन से उनके पुश्तैनी खेत पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं।
ताश के पत्तों की तरह ढह गया साढ़े चार मंजिला भवन भवन
शिमला के भट्ठाकुफर की माठू कॉलोनी में भी निर्माणाधीन परवाणू-शिमला फोरलेन के किनारे केस-2 कंक्रीट का भवन ढह गया। इसकी भारी बरसात से साढ़े चार मंजिला सभी मंजिलें ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। आधी रात को आसपास के लोगों को भी जान बचाकर भागना पड़ा। जीवन भर की कमाई से इस भवन को बनाने वाली रंजना वर्मा को अपनी बहन के घर रहने को मजबूर होना पड़ा है।
फोरलेन बनाने में हुई है भारी चूक : अजय
नेशनल हाईवे विंग के मुख्य अभियंता अजय कपूर ने माना कि हिमाचल में नेशनल हाईवे अथॉरिटी की ओर से बनाए जा रहे फोरलेन में चूक हुई है। 46 मीटर की जगह 32 मीटर जमीन का अधिग्रहण किया गया। जब जमीन ही कम अधिग्रहित की गई तो स्वाभाविक रूप से कम भूमि होने पर एनएचएचएआई को सीधी कटिंग करनी पड़ी।
वैज्ञानिक मापदंडों को निर्माण में नहीं अपनाया
हिमाचल प्रदेश में न तो प्रभावितों को उचित मुआवजा दिया गया और न फोरलेन को बनाते वक्त वैज्ञानिक मापदंडों को अपनाया गया। इस कारण हिमाचल प्रदेश आज संकट में है। बीआर कौंडल, अध्यक्ष फोरलेन भूमि अधिग्रहण मंच।
पहाड़ों की भौगोलिकता को समझकर ही फोरलेन बनें
सिंगल लेन बने हैं तो फोरलेन बनाने में भी दिक्कत नहीं होनी चाहिए। लेकिन जिस तरह से निर्माण हुआ है, उसमें भ्रष्टाचार साफ नजर आ रहा है। जब एक सदी पुराना अंग्रेजों के समय बना शिमला-कालका रेलवे ट्रैक भारी बरसात को झेल रहा है है तो फोरलेन क्यों नहीं। दुनिया में प्रदेश जैसी भौगोलिकता वाले क्षेत्रों में चौड़ी सड़कें बनी हैं। मैदानों की तकनीक के बजाय पहाड़ों की भौगोलिकता को समझकर ही फोरलेन बनने चाहिए। - तरुण श्रीधर, वन, पर्यावरण एवं राजस्व विभागों के प्रशासनिक सचिव रहे सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी।
कटिंग ठीक से हो रही है या नहीं यह बड़ा सवाल : डॉ. ख्याल चंद
पर्यावरणविद् एवं भूगोल विशेषज्ञ डॉ. ख्याल चंद फोरलेन समय की जरूरत है, पर इन्हें बनाने के तरीके समस्या है। पहला विषय यह है कि कटिंग ठीक से हो रही है या नहीं। फोरलेन बनाने के लिए जो बजट आ रहा है. उसका शत-प्रतिशत इस्तेमाल हो रहा है या नहीं। यह भी एक बड़ा सवाल है।
अध्ययन : फोरलेन बनाने के लिए तकनीक सही नहीं
जेपी यूनिवर्सिटी ऑफ इन्फॉरमेशन एंड टेक्नोलॉजी वाकनाघाट के अध्ययन अधिष्ठाता इंजीनियर डॉ. आलोक कुमार गुप्ता का कहना है कि इस विषय पर विश्वविद्यालय की ओर से कुछ अध्ययन किए गए हैं। इनमें पाया गया है कि फोरलेन बनाने की हिमाचल प्रदेश में अपनाई जा रही तकनीक सही नहीं है। सीधी कटिंग के बाद प्रोटेक्शन के लिए जिस तरह से दीवारें दी जा रही हैं, वे भी कामयाब नहीं हो रही हैं। भारी बरसात में यह तबाही का कारण बन रही हैं।
इन मंत्रियों ने भी उठाए हैं सवाल
लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने पंडोह से मनाली के बीच बार-बार भूस्खलन पर चिंता जताई है। कहा कि नदी के साथ-साथ फोरलेन का निर्माण किया गया है। डीपीआर पर भी सवाल उठाए हैं। ग्रामीण विकास मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने कंपनी के कार्यों पर सवाल उठाए हैं। कहा कि कंपनी ने भट्टाकुफर, ढली और कैथलीघाट में कंपनी ने 90 डिग्री एंगल में पहाड़ों का कटान कर दिया। इससे भवनों को खतरा हुआ है।